उँगली पै उठाय लिया गिरिराज, प्रबुद्ध, प्रवीण प्रशासक हो ।
तुम कालिय नाग के नाथनहार - सचेतक, तत्व-विचारक हो ।
कुबजा और द्रौपदि लाज रखी - तुम सत्य समाज सुधारक हो ।
तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही तुम ही अधिनायक हो ।।
प्रेम का पाठ पढ़ाया हमें और भक्ति का भाव सिखाते रहे हो ।
जीवन की महिमा हमको मुरली की धुनों में सुनाते रहे हो ।
सभ्य समाज बने इस हेतु स-कारण चीर चुराते रहे हो ।
गौ-कुल के हित साधन को खुद माखन चोर कहाते रहे हो ।।
माखन से मख सिद्ध किया नवनीत का स्वाद चखाया हमें ।
कंस से लोहा लिया तुमने जनतंत्र का मन्त्र सुझाया हमें ।
वक़्त के साथ चले हर वक़्त यों वक़्त का मोल बताया हमें ।
प्रेम सिवाय विकल्प नहीं यह पाठ तुम्हीं ने पढ़ाया हमें ।।
सखियों के सखा गउओं के गुपाल गुवालों के मीत कहाते रहे ।
ललिता के मनोहर जाम्बुवती सँग भी तुम रास रचाते रहे ।
सब से सब की सब भाँति सुचारू सदैव 'नवीन' निभाते रहे ।
समता के लिए तुम जन्म लिया समभाव की ज्योति जगाते रहे ।।
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4 वर्ष पहले
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