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हबीब जालिब की मशहूर नज़्म: ज़ुल्म की बात को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता 

हबीब जालिब की मशहूर नज़्म: ज़ुल्म की बात को मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
                
                                                         
                            दीप जिस का महल्लात ही में जले 
                                                                 
                            
चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले 
वो जो साए में हर मस्लहत के पले 
ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को 
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता 

मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से 
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से 
क्यूँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से 
ज़ुल्म की बात को जहल की रात को 
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता  आगे पढ़ें

6 वर्ष पहले

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