मुलाजिम हमको मत कहिये, बड़ा अफ़सोस होता है,
अदालत की अदब से हम यहाँ तशरीफ लाये हैं।
पलट देते हैं हम मौजे-हवादिस अपनी जुर्रत से,
कि हमने आंधियों में भी चिराग अक्सर जलाये हैं।
कांतिकारी शहीद, शायर, लेखक राम प्रसाद बिस्मिल की ये ऐतिहासिक पंक्तियां अपने आप में आजादी की लड़ाई का संपूर्ण दस्तावेज हैं। 'काकोरी काण्ड' का मुकदमा लखनऊ में चल रहा था। पण्डित जगतनारायण 'मुल्ला' सरकारी वकील के साथ उर्दू के शायर भी थे।
बिस्मिल जी से उनके कुछ मतभेद थे जिसका लाभ अंग्रेजों ने उठाया और 'मुल्ला' जी को सरकारी वकील बनाकर राम प्रसाद बिस्मिल के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया। 'मुल्ला' जी ने बहस के दौरान बिस्मिल और उनके साथियों को सजा दिलाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।
इसी उत्साह में अभियुक्तों के लिये "मुलजिम" की जगह "मुलाजिम" शब्द बोल दिया। फिर क्या था, पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' के अंदर का शायर जाग गया क्योंकि 'मुलाजिम' का मतलब नौकर होता है, उन्होंने तपाक से मुल्ला जी पर फिकरा कसते हुए या यूं कहें कि पुरजोर विरोध करते हुए ये शेर कहा- "मुलाजिम हमको मत कहिये, बड़ा अफ़सोस होता है"...उनका संदेश साफ था कि राजनीतिक बंदियों के लिए 'मुलाजिम' शब्द की जगह 'मुलजिम' का इस्तेमाल ही होना चाहिए। बिस्मिल जी चूंकि उर्दू के विद्वान थे इसलिए अपने क्रांतिकारी एहसासों को शायरी-ग़ज़ल की ज़ुबान में कलमबंद किया।
मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या
'काकोरी' षड्यंत्र के दौरान जब वे गोरखपुर जेल में कैद थे तब बड़ी तड़प और उम्मीद के साथ ये ग़ज़ल अपने साथियों के नाम भेजी थी-
मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या
दिल की बर्वादी के बाद उनका पयाम आया तो क्या
मिट गईं जब सब उम्मीदें मिट गए जब सब ख़याल,
उस घड़ी ग़र नामावर लेकर पयाम आया तो क्या !
ऐ दिले-नादान मिट जा तू भी कू-ए-यार में,
फिर मेरी नाकामियों के बाद काम आया तो क्या !
काश! अपनी जिंदगी में हम वो मंजर देखते,
यूँ सरे-तुर्बत कोई महशर-खिराम आया तो क्या !
आख़िरी शब दीद के काबिल थी 'बिस्मिल' की तड़प,
सुब्ह-दम कोई अगर बाला-ए-बाम आया तो क्या !
ग़ज़ल के माध्यम से ही उन्होंने संदेशा भिजवाया, दरअसल वो जेल से बाहर निकलना चाहते थे ताकि क्रांति की मशाल को और आगे ले जा सकें और इसलिए वो अपने साथियों से इस ग़ज़ल के माध्यम से अपील कर रहे थे कि- समय रहते अगर उन्हें नहीं छुड़ाया गया तो फिर कोई मतलब नहीं रह जायेगा।
मुल्क की माली हालत को खस्ता होता देखकर लिखी गयी बिस्मिल की ये पंक्तियाँ अपने आप में अमर हैं-
“तबाही जिसकी किस्मत में लिखी वर्के-हसद से थी,
उसी गुलशन की शाखे-खुश्क पर है आशियाँ मेरा।”
दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा
आजादी के लिए जितनी तड़प थी उनके मन में, उतनी ही नफरत थी गुलामी पसंद शोषकों के प्रति। बिस्मिल की शायरी और ग़ज़लों में उनके क्रांतिकारी विचारों की अभिव्यक्ति है-
दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा,
एक बार ज़माने को आज़ाद बना दूंगा।
बेचारे ग़रीबों से नफ़रत है जिन्हें, एक दिन,
मैं उनकी अमरी को मिट्टी में मिला दूंगा।
यह फ़ज़ले-इलाही से आया है ज़माना वह,
दुनिया की दग़ाबाज़ी दुनिया से उठा दूंगा।
ऐ प्यारे ग़रीबों! घबराओ नहीं दिल में
हक़ तुमको तुम्हारे, मैं दो दिन में दिला दूंगा।
बंदे हैं ख़ुदा के सब, हम सब ही बराबर हैं,
ज़र और मुफ़लिसी का झगड़ा ही मिटा दूंगा।
जो लोग ग़रीबों पर करते हैं सितम नाहक़,
ग़र दम है मेरा क़ायम, गिन-गिन के सज़ा दूंगा।
वो चुप रहने को कहते हैं, जो हम फ़रियाद करते हैं
जब वे गरीबों के प्रति अपनी संवेदनशीलता जाहिर करते हैं, तब फिरंगियों के प्रति अपनी नफरत का इज़हार करते ही हैं साथ ही उन मुनाफाखोरों को भी धिक्कारते हैं जो शोषण की जमीन तैयार करते हैं, गरीबों पर सितम ढाते हैं। गरीबी-मुफलिसी के लिए जितनी तकलीफ बिस्मिल के मन में है उतना ही गुस्सा भी है-
यह कह-कहकर बसर की, उम्र हमने कै़दे-उल्फ़त में,
वो अब आज़ाद करते हैं, वो अब आज़ाद करते हैं।
सितम ऐसा नहीं देखा, जफ़ा ऐसी नहीं देखी,
वो चुप रहने को कहते हैं, जो हम फ़रियाद करते हैं।
यह बात अच्छी नहीं होती, यह बात अच्छी नहीं करते,
हमें बेकस समझकर आप क्यों बरबाद करते हैं?
कोई बिस्मिल बनाता है, जो मक़तल में हमें ‘बिस्मिल’,
तो हम डरकर दबी आवाज़ से फ़रियाद करते हैं।
रामप्रसाद बिस्मिल की शायरी का एक-एक शब्द आज भी शोषण और बेकारी के खिलाफ है, देशप्रेम उनकी नस-नस में था।
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मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या
2 वर्ष पहले
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