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है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए...

गोपाल दास नीरज
                
                                                         
                            -गोपाल दास नीरज- 
                                                                 
                            

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए 
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए 

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह 
अब जनाज़ा ज़ोर से उन का निकलना चाहिए 

अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्मा 
ये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए 

फूल बन कर जो जिया है वो यहां मसला गया 
ज़ीस्त को फ़ौलाद के सांचे में ढलना चाहिए 

छीनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो 
आंख से आंसू नहीं शोला निकलना चाहिए 

दिल जवां सपने जवां मौसम जवां शब भी जवां 
तुझ को मुझ से इस समय सूने में मिलना चाहिए 


(साभार- कविता कोश)
9 वर्ष पहले

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