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हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का : नज़ीर अकबराबादी

दिवाली
                
                                                         
                            हर इक मकाँ में जला फिर दिया दिवाली का 
                                                                 
                            
हर इक तरफ़ को उजाला हुआ दिवाली का 
सभी के दिल में समाँ भा गया दिवाली का 
किसी के दिल को मज़ा ख़ुश लगा दीवाली का 
अजब बहार का है दिन बना दिवाली का 
 

जहाँ में यारो अजब तरह का है ये त्यौहार 
किसी ने नक़्द लिया और कोई करे है उधार 
खिलौने खेलों बताशों का गर्म है बाज़ार 
हर इक दुकाँ में चराग़ों की हो रही है बहार 
सभों को फ़िक्र है अब जा-ब-जा दिवाली का 
 
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5 वर्ष पहले

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