आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जी हां हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूं : भवानीप्रसाद मिश्र

भवानी प्रसाद मिश्र
                
                                                         
                            जी हां हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूं,
                                                                 
                            
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूं,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूं !

जी, माल देखिये दाम बताऊंगा,
बेकाम नहीं हैं काम बताऊंगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत सख़्त सर-दर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा !

जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको,
पर बाद-बाद में अक़्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान,
जी, आप न हों सुनकर ज़्यादा हैरान-
मैं सोच-समझकर आख़िर,
अपने गीत बेचता हूं,
जी हां हुजूर, मैं गीत बेचता हूं,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूं !
आगे पढ़ें

5 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर