जी हां हुज़ूर, मैं गीत बेचता हूं,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूं,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूं !
जी, माल देखिये दाम बताऊंगा,
बेकाम नहीं हैं काम बताऊंगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत सख़्त सर-दर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा !
जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको,
पर बाद-बाद में अक़्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान,
जी, आप न हों सुनकर ज़्यादा हैरान-
मैं सोच-समझकर आख़िर,
अपने गीत बेचता हूं,
जी हां हुजूर, मैं गीत बेचता हूं,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूं !
यह गीत सुबह का है, गाकर देखें,
यह गीत ग़ज़ब का है, ढाकर देखें,
यह गीत ज़रा सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहां पूने में लिक्खा था,
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है !
यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
जी, यह मसान में भूख जगाता है,
यह गीत भुवाली की है हवा हुज़ूर,
यह गीत तपेदिक की है दवा हुजूर,
जी, और गीत भी हैं दिखलाता हूं,
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूं।।
जी, छन्द और बेछन्द पसंद करें,
जी अमर गीत और वे जो तुरत मरें !
ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं ले आता हूं क़लम और दावात,
इनमें से भाए नहीं , नए लिख दूं,
मैं नए पुराने सभी तरह के गीत बेचता हूं
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूं!
जी, छन्द और बेछन्द पसंद करें,
जी अमर गीत और वे जो तुरत मरें !
ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं ले आता हूं क़लम और दावात,
इनमें से भाए नहीं, नए लिख दूं,
मैं नए पुराने सभी तरह के गीत बेचता हूं
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूं!
जी, गीत जनम का लिखूं, मरण का लिखूं
जी, गीत जीत का लिखूं, शरण का लिखूं,
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का !
कुछ और डिजाइन भी हैं, यह इल्मी
यह लीजे चलती चीज़, नई फ़िल्मी,
यह सोच-सोचकर मर जाने का गीत,
मैं लिखता ही तो रहता हूं दिन-रात,
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत !
जी, बहुत ढेर लग गया, हटाता हूं,
ग्राहक की मर्जी, अच्छा जाता हूं,
या भीतर जाकर पूछ आइये आप,
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप,
क्या करूं मगर लाचार
हारकर गीत बेचता हूं !
जी हां, हुज़ूर मैं गीत बेचता हूं !
साभार : भवानीप्रसाद मिश्र, प्रतिनिधि कविताएं (राजकमल प्रकाशन)
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5 वर्ष पहले
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