उस शख़्स के ग़म का कोई अंदाज़ा लगाए,
जिसको कभी रोते हुए देखा न किसी ने।
~वकील अख़्तर
जैसा दर्द हो वैसा मंज़र होता है,
मौसम तो इंसान के अंदर होता है।
~अज़ीज़ ऐजाज़
अज़ल तो मुफ़्त में बदनाम है ज़माने में,
कुछ उनसे पूछ, जिन्हें ज़िंदगी ने मारा है।
~फ़ैज़
तिरे चराग़ अलग हों, मिरे चराग़ अलग,
मगर उजाला तो फिर भी जुदा नहीं होता।
~वसीम बरेलवी
मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
~मजरूह सुल्तानपुरी
रगों में दौड़ने-फ़िरने के हम नहीं कायल,
जो आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
~ग़ालिब
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X