बिहार के सारन ज़िले में 18 दिसबंबर 1887 को पैदा हुए भिखारी ठाकुर एक चर्चित गीतकार, गायक, नाटककार, नर्तक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। ठाकुर को 'शेक्सपियर ऑफ भोजपुरी' भी कहा जाता है। अपने फ़न के ज़रिए लोकप्रियता की बुलंदियों को छूने वाले भिखारी ठाकुर ने 10 जुलाई 1971 को अंतिम सांस ली।
चलनी के चालल दुलहा
चलनी के चालल दुलहा सूप के फटकारल हे,
दिअका के लागल बर दुआरे बाजा बाजल हे।
आंवा के पाकल दुलहा झांवा के झारल हे
कलछुल के दागल, बकलोलपुर के भागल हे।
सासु का अंखिया में अन्हवट बा छावल हे
आइ कs देखऽ बर के पान चभुलावल हे।
आम लेखा पाकल दुलहा गांव के निकालल हे
अइसन बकलोल बर चटक देवा का भावल हे।
मउरी लगावल दुलहा, जामा पहिरावल हे
कहत ‘भिखारी’ हवन राम के बनावल हे।
करिके गवनवा, भवनवा में छोड़ि कर
करिके गवनवा, भवनवा में छोड़ि कर, अपने परईलन पुरूबवा बलमुआ।
अंखिया से दिन भर, गिरे लोर ढर ढर, बटिया जोहत दिन बितेला बलमुआ।
गुलमा के नतिया, आवेला जब रतिया, तिल भर कल नाही परेला बलमुआ।
का कईनी चूकवा, कि छोडल मुलुकवा, कहल ना दिलवा के हलिया बलमुआ।
सांवली सुरतिया, सालत बाटे छतिया, में एको नाही पतिया भेजवल बलमुआ।
घर में अकेले बानी, ईश्वरजी राख पानी, चढ़ल जवानी माटी मिलेला बलमुआ।
ताक तानी चारू ओर, पिया आके कर सोर, लवटो अभागिन के भगिया बलमुआ।
कहत 'भिखारी' नाई, आस नइखे एको पाई, हमरा से होखे के दीदार हो बलमुआ।
प्यार विलाप
हाय हाय राजा कैसे कटिये सारी रतिया
जबले गइले राजा सुधियो ना लिहले, लिखिया ना भेजे पतिया । हाय हाय
हाय दिनवां बितेला सैयां बटिया जोहत तोर, तारा गिनत रतियां । हाय हाय
जब सुधि आवै सैयां तोरी सुरतिया बिहरत मोर छतिया । हाय हाय
नाथ शरन पिया भइले बेदरदा मनलेना मोर बतिया । हाय हाय
हमरा बलमु जी के बड़ी-बड़ी अंखिया से
हमरा बलमु जी के बड़ी-बड़ी अंखिया से,
चोखे-चोखे बाड़े नयना कोर रे बटोहिया।
ओठवा त बाड़े जइसे कतरल पनवा से,
नकिया सुगनवा के ठोर रे बटोहिया।
दँतवा ऊ सोभे जइसे चमके बिजुलिया से,
मोंछियन भंवरा गुंजारे रे बटोहिया।
मथवा में सोभे रामा टेढ़ी कारी टोपिया से,
रोरी बूना सोभेला लिलार रे बटोहिया।।
बेटी विलाप
गिरिजा-कुमार!, कर दुखवा हमार पार;
ढर-ढर ढरकत बा लोर मोर हो बाबूजी।
पढल-गुनल भूलि गइल समदल भेंड़ा भइल
सउदा बेसाहे में ठगइल हो बाबूजी।
केइ अइसन जादू कइल, पागल तोहार मति भइल
नेटी काटि के बेटी भसिअवलऽ हो बाबूजी।
रोपेया गिनाई लिहल पगहा धराई दिहल
चेरिया के छेरिया बनवल हो बाबूजी।
साफ क के आंगन-गली, छीपा-लोटा जूठ मलिके;
बनि के रहलीं माई के टहलनी हो बाबूजी।
गोबर-करसी कइला से, पियहा-छुतिहर घइला से;
कवना करनियां में चुकली हों बाबूजी।
बर खोजे चलि गइल, माल लेके घर में धइल
दादा लेखा खोजल दुलहवा हो बाबूजी।
अइसन देखवल दुख, सपना भइल सुख
सोनवां में डलल सोहागावा हो बाबूजी।
बुढऊ से सादी भइल, सुख वो सोहाग गइल
घर पर हर चलववल हो बाबूजी।
अबहूं से कर चेत, देखि के पुरान सेत डोला
काढ़, मोलवा मोलइह मत हो बाबूजी।
घूठी पर धोती, तोर, आस कइल नास मोर
पगली पर बगली भरवल हो बाबूजी।
हंसत बा लोग गॅइयां के, सूरत देखि के संइयाँ के
खाइके जहर मरि जाइब हम हो बाबूजी।
खुसी से होता बिदाई, पथल छाती कइलस माई
दूधवा पिआई बिसराई देली हो बाबूजी।
लाज सभ छोडि़ कर, दूनो हाथ जोड़ि कर
चित में के गीत हम गावत बानीं हो बाबूजी।
प्राणनाथ धइलन हाथ, कइसे के निबही अब साथ
इहे गुनि-गुनि सिर धूनत बानी हो बाबूजी।
बुद्ध बाड़न पति मोर, चढ़ल बा जवानी जोर
जरिया के अरिया से कटल हो बाबूजी।
अगुआ अभागा मुंहलागा अगुआन होके;
पूड़ी खाके छूड़ी पेसि दिहलसि हो बाबूजी।
रोबत बानी सिर धुनि, इहे छछनल सुनि;
बेटी मति बेंचक दीह केहू के हो बाबूजी।
आपन होखे तेकरो के, पूछे आवे सेकरों के
दीह मति पति दुलहिन जोग हो बाबूजी।
(साभार- कविता कोश)
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