खड़ी लुगाइयां के मांह सुथरी श्यान की बहू
खड़ी लुगाइयां के मांह सुथरी श्यान की बहू
पर थी कर्म हीन कंगाल किसान की बहू
गळ में सोने का पैंडल या हार चाहिए था
बिंदी सहार बोरळा सब शिंगार चाहिए था
सूट रेशमी चीर किनारीदार चाहिए था
इसी इसी नै तो ठाडा घर बार चाहिए था
रुक्का पड़ता जो होती धनवान की बहू
चारों तरफ लुगाइयां की पंचात कर रही थी
सब की गेलां मीठी मीठी बात कर रही थी
बात करण म्हं पढ़ी लिखी नै मात कर रही थी
दीखै थी जणु सोलह पास जमात कर रही थी
बैठी पुजती जो होती विद्वान की बहू
मस्तानी आंख्यां म्हं मीठा प्यार दीखै था
गोरे रंग रूप म्हं हुआ त्योहार दीखै था
हट्टा कट्टा गात कसा एक सार दीखै था
नखरा रोब गजब का बेशुमार दीखै था
दबते माणस जो होती कप्तान की बहू
इज्जत आगै दौलत नै ठुकरावण वाळी थी
टोटे म्हं भी अपनी लाज बचावण वाळी थी
पतिव्रता नारा का फर्ज पुगावण वाळी थी
पीहर और सासरे नै चमकावण वाळी थी
“ज्ञानी राम “ जणु लिछमी थी भगवान की बहू
उथल पुथल मचगी दुनियां म्हं
उथल पुथल मचगी दुनियां म्हं, निर्धन लोग तबाह होग्ये
कोए चीज ना सस्ती मिलती, सबके ऊंचे होग्ये
असली चीज मिलै ना टोही, सब म्हं नकलीपण होग्या
बिना मिलावट चैन पड़ै, सब का पापी मन होग्या
दिन धोळी ले तार आबरु जिसकै धोरै धन होग्या
निर्धन मरजै तड़फ तड़फ कै, इतना घोर बिघन होग्या
इज्जतदार मरैं भूखें, बदमाश लफगें शाह होग्ये
ठाड़े धरती के मालिक, नक्शे इंतकाल भरे रहज्यां
पकड़े झां निर्दोष पुरुष, पापी बदकार परे रहज्यां
घर बैठें लें देख फैसला, गवाह वकील करे रहज्यां
जिसकी चालै कलम पकड़ लें, सब कानून धरे रहज्यां
क्यूंकर मुलजिम पकड़े जां जब अफसर लोग ग्वाह होग्ये
बेरोजगारी की हद होगी, पढ़े-लिखे बेकार फिरैं
घटी आमदनी बधगे खर्चे, किस-किस कै सिर मार मरैं
बड़े-बड़े दो पिस्यां खातर, अपणी इज्जत तार धरैं
धर्म के ठेकेदार बी, भूंडी तै भूंडी कार करैं
भोळे लोगां नै लूटण के , बीस ढाळ के राह होग्ये
कई जणां कै कोठी बंग़ले, लाईन लागरी कारां की
पड़े सड़क पै कई जणे, लाठी बरसैं चौंकीदारां की
बिस्कुट दूध-मलाई खावैं, बिल्ली साहूकारां की
खाली जून टळै भूख्यां की, निर्धन लोग बेचारां की
“ज्ञानी राम” न्यूं देख-देख कै, घणे कसूते घा होग्ये
गऊ कहाया करते थे भारत के लोग लुगाई
गऊ कहाया करते थे भारत के लोग लुगाई
जोंक, भेडिये, मगरमच्छ अब देते नाग दिखाई
बण कै जोंक लहू चूसैं यें साहूकार देश के
भूखे नंगे फिरैं बेचारे ताबेदार देश के
कोठी बंगलां म्हं रहते असली गद्दार देश के
आंख मीच के सोग्ये सारे पहरेदार देश के
भरैं तजूरी ठोक ठोक करैं अन्धां धुन्ध कमाई
बणे भेड़िये भारत के यें परमट कोट्यां वाळे
नाम करा कै डिपू रूट दिन धौळी पाड़ै चाळे
मीठी मीठी बात करैं यें पर भीतर तै काळे
अफसर और वजीरां के झट बणैं भतीजे साळे
बकरी भेड़ समझ निर्धन नै करज्यां तुरंत सफाई
रिश्वतखोर मगरमच्छ बणगे खावैं ऊठ ऊठ कै
जै मिल ज्या मजबूर दुखी कोय पड़ते टूट टूट कै
लाखां के मालिक बणग्ये, लोगां नै लूट लूट कै
बिन रिश्वत ना काम करैं चाहे रोल्यो फूट फूट कै
आठों पहर रहैं मुंह बायें पापी नीच कसाई
काळे नाग बणे जहरी यें बड़े बड़े व्यापारी
चीनी तेल नाज घी लोहा कर लें कट्ठा भारी
फण ताणे बैठे रहैं भूखी मरज्या दुनिया दारी
चढ़ज्यां रेट शिखर म्हं जब यें जिनस काढ़ दें सारी
“ज्ञानी राम इन चार जणां नै कर दी घोर तबाही
मात पिता के मरें बाद आंसू टपकाकै के होगा
मात पिता के मरें बाद आंसू टपकाकै के होगा
जिन्दें जी जूते मारे फेर फूल चढ़ाकै के होगा
कहणा मन्या नहीं कदे फेर तिलक लगणा ठीक नहीं
छुए कोन्या पैर कदे फेर शीश झुकाणा ठीक नहीं
राखे सदा अन्धेरे म्हं फेर दीप जळाणा ठीक नहीं
नाक चढ़ाकै रोटी दी फेर पिंड भराणा ठीक नहीं
बोले कड़वे बोल सदा फेर श्राद्ध कराकै के होगा
बिछुड़ॆ बाद बड़ाई करते बेटे पोते देख लिये
कर कर य्काद लाड़ बचप्न के पाछै रोते देख लिये
पितरां खातिर गंगा जी म्हं लाते गोते देख लिये
लगी हुई कमरां में फोटू मल मल धोते देख लिये
रहे तड़पते वस्त्र बिन फेर शाल उढ़ाकै के होगा
काढ़े दोष सदा जिनके फेर पाछे तै गुण गावैं सैं
दुखी करे जिन्दगी भर फेर मन्दिर में पत्थर लावैं सैं
घूर घूर देखणियें फेर फोटू पै ध्यान जमावैं सैं
सदा उछाळी पगड़ी फेर पग़ड़ी की रस्म निभावैं सैं
दुख म्हं करी नहीं सेवा फेर पेहवे जाकै के होगा
कर ल्यो जिन्दे जी सेवा या आच्छी किसमत थारी सै
आर्शीवाद मिले दिल तै जो बेटा आज्ञाकारी सै
खुद अपनी संतान भला ना लागै किस नै प्यारी सै
कोए अमर ना रहा जगत म्हं आखिर सब की बारी सै
“ज्ञानी राम” दो हरफी कह दी ढोल बजाकै के होगा
इस भारत म्हं दुनिया तै एक ढंग देख लिया न्यारा
इस भारत म्हं दुनिया तै एक ढंग देख लिया न्यारा
खाज्या घणा कबज होग्या एक भूखा मरै बेचारा
एक जणे की चढ़ी किराये कई कई बिल्डिंग कोठी
एक जणे नै मिलै रहण अनै कोन्या एक तमोटी
एक जणे की खा खा मेर्वे हुई दूंदड़ी मोटी
एक जणे नै पेट भराई कोन्या मिलती रोटी
एक जणा बैठा गद्दी पर दे रहा एक सहारा
एक जणे कै दस दस नौकर सब पर हुक्म चलाता
एक जणे नै नौकर भी कोय घर मैं न नहीं लगाता
एक जणा न्हा धोके सिर म्हं इतर फलेल लगाता
एक जणे नै न्हाणे नै भी नीर मिलै ना ताता
एक फिरै कारां म्हं दूजा भटकै मारा मारा
एक जणा दे खर्च लाख पर करता नहीं पढ़ाई
एक जणा पढ़णा चाहवै पर फीस किते ना थ्याई
एक जणे कै बीस वर्ष में दो दो तीन लुगाई
एक जणे की उमर बीत गई कोन्या हुई सगाई
दस पोशाक एक पै दूजा नांगा करै गुजारा
एक जणे के घर म्हं आवै अन्धा धुन्ध कमाई
एक जणे के घर म्हं कोन्या जहर खाण नै पाई
एक जणे कै बीस आदमी करते मन की चाहे
एक जणे के घर म्हं कोन्या बतळावन नै भाई
“ज्ञानी राम” पता ना कद यू फर्क मिटैगा म्हारा
(साभार- कविता कोश)
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