भारतेंदु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 बनारस के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनका मूल नाम 'हरिश्चन्द्र' था और 'भारतेंदु' उनकी उपाधि थी। भारतेन्दु आधुनिक हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी थियेटर के भी पितामह कहे जाते हैं।
नैन भरि देखौ गोकुल-चंद
नैन भरि देखौ गोकुल-चंद
श्याम बरन तन खौर बिराजत अति सुंदर नंद-नंद
विथुरी अलकैं मुख पै झलकैं मनु दोऊ मन के फंद
मुकुट लटक निरखत रबि लाजत छबि लखि होत अनंद
संग सोहत बृषभानु-नंदिनी प्रमुदित आनंद-कंद
’हरीचंद’ मन लुब्ध मधुप तहं पीवत रस मकरंद
होली
कैसी होरी खिलाई
आग तन-मन में लगाई
पानी की बूंदी से पिंड प्रकट कियो सुंदर रूप बनाई
पेट अधम के कारन मोहन घर-घर नाच नचाई
तबौ नहिं हबस बुझाई
भूंजी भांग नहीं घर भीतर, का पहिनी का खाई
टिकस पिया मोरी लाज का रखल्यो, ऐसे बनो न कसाई
तुम्हें कैसर दोहाई
कर जोरत हौं बिनती करत हूं छांड़ो टिकस कन्हाई
आन लगी ऐसे फाग के ऊपर भूखन जान गंवाई
तुन्हें कछु लाज न आई
है है उर्दू हाय हाय
है है उर्दू हाय हाय कहां सिधारी हाय हाय
मेरी प्यारी हाय हाय मुंशी मुल्ला हाय हाय
बल्ला बिल्ला हाय हाय रोये पीटें हाय हाय
टांग घसीटैं हाय हाय सब छिन सोचैं हाय हाय
डाढ़ी नोचैं हाय हाय दुनिया उल्टी हाय हाय
रोजी बिल्टी हाय हाय सब मुखतारी हाय हाय
किसने मारी हाय हाय खबर नवीसी हाय हाय
दांत पीसी हाय हाय एडिटर पोसी हाय हाय
बात फरोशी हाय हाय वह लस्सानी हाय हाय
चरब-जुबानी हाय हाय शोख बयानि हाय हाय
फिर नहीं आनी हाय हाय
जागे मंगल-रूप सकल ब्रज-जन-रखवारे
जागे मंगल-रूप सकल ब्रज-जन-रखवारे
जागो नन्दानन्द -करन जसुदा के बारे
जागे बलदेवानुज रोहिनि मात-दुलारे
जागो श्री राधा के प्रानन तें प्यारे
जागो कीरति-लोचन-सुखद भानु-मान-वर्द्धित-करन
जागो गोपी-गो-गोप-प्रिय भक्त-सुखद असरन-सरन
बंदर सभा
(इन्दर सभा उर्दू में एक प्रकार का नाटक है वा नाटकाभास है और यह
बन्दर सभा उसका भी आभास है।)
आना राजा बंदर का बीच सभा के
सभा में दोस्तो बंदर की आमद आमद है
गधे औ फूलों के अफसर जी आमद आमद है
मरे जो घोड़े तो गदहा य बादशाह बना
उसी मसीह के पैकर की आमद आमद है
व मोटा तन व थुंदला थुंदला मू व कुच्ची आंख
व मोटे ओठ मुछंदर की आमद आमद है
हैं खर्च खर्च तो आमद नहीं खर-मुहरे की
उसी बिचारे नए खर की आमद आमद है
बोले जवानी राजा बंदर के बीच अहवाल अपने के
पाजी हूं मं कौम का बंदर मेरा नाम
बिन फुजूल कूदे फिरे मुझे नहीं आराम
सुनो रे मेरे देव रे दिल को नहीं करार
जल्दी मेरे वास्ते सभा करो तैयार
लाओ जहाँ को मेरे जल्दी जाकर ह्यां
सिर मूड़ैं गारत करैं मुजरा करैं यहां
आना शुतुरमुर्ग परी का बीच सभा में
आज महफिल में शुतुरमुर्ग परी आती है
गोया गहमिल से व लैली उतरी आती है
तेल और पानी से पट्टी है सँवारी सिर पर
मुँह पै मांझा दिये लल्लादो जरी आती है
झूठे पट्ठे की है मुबाफ पड़ी चोटी में
देखते ही जिसे आंखों में तरी आती है
पान भी खाया है मिस्सी भी जमाई हैगी
हाथ में पायंचा लेकर निखरी आती है
मार सकते हैं परिन्दे भी नहीं पर जिस तक
चिड़िया-वाले के यहां अब व परी आती है
जाते ही लूट लूं क्या चीज खसोटूं क्या शै
बस इसी फिक्र में यह सोच भरी आती है
गजल जवानी शुतुरमुर्ग परी हसन हाल अपने के
गाती हूं मैं औ नाच सदा काम है मेरा
ऐ लोगो शुतुरमुर्ग परी नाम है मेरा
फन्दे से मेरे कोई निकले नहीं पाता
इस गुलशने आलम में बिछा दाम है मेरा
दो चार टके ही पै कभी रात गँवा दूं
कारूं का खजाना कभी इनआम है मेरा
पहले जो मिले कोई तो जी उसका लुभाना
बस कार यही तो सहरो शाम है मेरा
शुरफा व रुजला एक हैं दरबार में मेरे
कुछ सास नहीं फैज तो इक आम है मेरा
बन जाएँ जुगत् तब तौ उन्हें मूड़ हा लेना
खली हों तो कर देना धता काम है मेरा
जर मजहबो मिल्लत मेरा बंदी हूं मैं जर की
जर ही मेरा अल्लाह है जर राम है मेरा
(छंद जबानी शुतुरमुर्ग परी)
राजा बन्दर देस मैं रहें इलाही शाद
जो मुझ सी नाचीज को किया सभा में याद
किया सभा में याद मुझे राजा ने आज
दौलत माल खजाने की मैं हूं मुंहताज
रूपया मिलना चाहिये तख्त न मुझको ताज
जग में बात उस्ताद की बनी रहे महराज
ठुमरी जबानी शुतुरमुर्ग परी के
आई हूं मैं सभा में छोड़ के घर
लेना है मुझे इनआम में जर
दुनिया में है जो कुछ सब जर है
बिन जर के आदमी बन्दर है
बन्दर जर हो तो इन्दर है
जर ही के लिये कसबो हुनर है
गजल शुतुरमुर्ग परी की बहार के मौसिम में
आमद से बसंतों के है गुलजार बसंती
है फर्श बसंती दरो-दीवार बसंती
आंखों में हिमाकत का कंवल जब से खिला है
आते हैं नजर कूचओ बाजार बसंती
अफयूँ मदक चरस के व चंडू के बदौलत
यारों के सदा रहते हैं रुखसार बसंती
दे जाम मये गुल के मये जाफरान के
दो चार गुलाबी हां तो दो चार बसंती
तहवील जो खाली हो तो कुछ कर्ज मंगा लो
जोड़ा हो परी जान का तैयार बसंती
होली जबानी शुतुरमुर्ग परी के
पा लागों कर जोरी भली कीनी तुम होरी
फाग खेलि बहुरंग उड़ायो ओर धूर भरि झोरी
धूँधर करो भली हिलि मिलि कै अधाधुंध मचोरी
न सूझत कहु चहुं ओरी
बने दीवारी के बबुआ पर लाइ भली विधि होरी
लगी सलोनो हाथ चरहु अब दसमी चैन करो री
सबै तेहवार भयो री
साभार- कविता कोश
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