भारत के दिवंगत भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार संसद के सत्र में कहा था कि - "सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए।" चूंकि देश सर्वोपरि है और एक राजनेता को अव्व्ल अपने देश के लिए पूरी निष्ठा से काम करना चाहिए। अटल बिहारी वाजपेयी एक नेता तो थे ही साथ ही कविताएं भी लिखा करते थे। उन्होंने देश के लिए भी कविताएं लिखीं।
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है
हिमालय मस्तक है
कश्मीर किरीट है
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं
कन्याकुमारी इसके चरण हैं
सागर इसके पग पखारता है
यह चन्दन की भूमि है
अभिनन्दन की भूमि है
यह तर्पण की भूमि है
यह अर्पण की भूमि है
दुनिया का इतिहास पूछता
रोम कहाँ, यूनान कहाँ?
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता
वह उन्नत ईरान कहाँ है?
दीप बुझे पश्चिमी गगन के
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा
किन्तु चीर कर तम की छाती
चमका हिन्दुस्तान हमारा
शत-शत आघातों को सहकर
जीवित हिन्दुस्तान हमारा
जग के मस्तक पर रोली सा
शोभित हिन्दुस्तान हमारा
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दुनिया का इतिहास पूछता
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