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पाकिस्तान पर 'अटल' जी की कविता...

आज अटल जी की यह कविता याद आई - ओ नादान पड़ोसी अपनी आँखें खोलो...
                
                                                         
                            एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, 
                                                                 
                            
पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा।

अगणित बलिदानों से अर्जित यह स्वतन्त्रता, 
अंश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता। 
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता, 
दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता।

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो,
चिनगारी का खेल बुरा होता है  
औरों के घर आग लगाने का जो सपना, 
वो अपने ही घर में सदा खरा होता है।

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो, 
अपने पैरों आप कुल्हाड़ी नहीं चलाओ। 
ओ नादान पड़ोसी अपनी आँखें खोलो, 
आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ।
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7 वर्ष पहले

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