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साला ही गरम मसाला है : गोपालप्रसाद व्यास की गुदगुदा देनेवाली हास्य कविता

प्रतीकात्मक तस्वीर
                
                                                         
                            हे दुनिया के संतप्त जनो,
                                                                 
                            
पत्नी-पीड़ित हे विकल मनो,
कूँआ प्यासे पर आया है
मुझ बुद्धिमान की बात सुनो!
यदि जीवन सफल बनाना है
यदि सचमुच पुण्य कमाना है,
तो एक बात मेरी जानो
साले को अपना गुरु मानो!
छोड़ो मां-बाप बिचारों को
छोड़ो बचपन के यारों को,
कुल-गोत्र, बंधु-बांधव छोड़ो
छोड़ो सब रिश्तेदारों को।
छोड़ो प्रतिमाओं का पूजन
पूजो दिवाल के आले को,
पत्नी को रखना है प्रसन्न
तो पूजो पहले साले को।
गंगा की तारन-शक्ति घटी
यमुना का पानी क्षीण हुआ,
काशी की करवट व्यर्थ हुई
मथुरा भी दीन-मलीन हुआ।
अब कलियुग में ससुराल तीर्थ
जीवित-जाग्रत पहचानो रे!
यदि अपनी सुफल मनानी है
साले को पंडा मानो रे! 

इस भवसागर से तरने को
साला ही तरल त्रिवेणी है,
भव-बाधाओं पर चढ़ने को
साला मजबूत नसैनी है।
गृह-कलह-कष्ट काटन के हित
साला ही तेज कतरनी है,
पत्नी-भक्तों की माला में
साला ही श्रेष्ठ सुमरनी है।
इस अग-जग के अंधियारे में
साला ही सिर्फ उजाला है,
विधना की कौतुक रचना में
साले का ठाठ निराला है।
साला ही सुख की कुंजी है,
पत्नी तो केवल ताला है,
भाई हो सकता ढाल मगर
साला तो पैना भाला है।
वह जिस उर में छिद गया
प्राण उसके ही हरने वाला है,
वह जिस घर में घुस गया
वहां से नहीं निकलने वाला है।
इसलिए जगत के जीजाओ,
अब अपनी खैर मनाओ तुम
दुनिया में सुख से रहना है
साले को शीश नवाओ तुम। 
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5 वर्ष पहले

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