हिन्दी साहित्यिक प्रकाशन पर नजर डालें तो अब हमें कविता जगत से गुजरना होगा। इस साल कई महत्वपूर्ण कवियों की किताबें प्रकाशित हुई हैं और चर्चित भी। हालांकि यह कहा जाता रहा है कि कविता के पाठक नहीं मिलते और अब तो यह स्थायी रूप से प्रचारित किया जाने लगा है कि कविता-संग्रह बिकते नहीं। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कविता हमेशा से सबसे अधिक पढे जाने वाली विधा रही है। इस वर्ष जिन कवियों के संग्रह आए हैं उनमें रामदरश मिश्र, श्रीप्रकाश शुक्ल, व राजेंद्र नागदेव, कृष्ण कल्पित, आशुतोष दुबे, अनामिका, सविता सिंह, सुमन केशरी जैसी वरिष्ठ कवि-कवयित्रियों के संग्रह आए है। साथ ही जेसिंता केरकेट्टा, जोशना बनर्जी, सुलोचना वर्मा, अनुपम सिंह, ऋतु त्यागी जैसे युवा कवयित्रियों के भी संग्रह भी चर्चित रहे हैं। युवा कवि भरत प्रसाद का लंबी कविताओं का संग्रह 'थका सूरज चमकता है' भी पठनीय है। कोरोना, सीरिया समस्या के साथ साथ पूर्वोत्तर भारत पर केंद्रित कविताएं इसे महत्वपूर्ण बनाती हैं।
इस क्रम में इस वर्ष प्रकाशित इन कविता-संग्रहों में विचरण करते हुए समकालीन कविता के परिवेश पर गहन दृष्टि डाली जा सकती है। इन संग्रहों की यह विशेषता है कि ये भावभूमि के स्तर पर सामाजिक मूल्यों की स्थापना, मानव का जीवन-संघर्ष, कोरोना काल के बाद की जिंदगी, स्त्रीयों की समस्याओं आदि का बखान करते हैं।
आशा-निराशा के इस वर्तमान समय में ये कविता-संग्रह न सिर्फ समय का आईना प्रस्तुत करती हैं बल्कि हमें सोचने पर मजबूर भी करती हैं कि हमने इस दुनिया को क्या से क्या बना दिया है और हम किस तरह की जीवन की ओर बढ़ रहे हैं। बलात्कार, चोरी, भ्रष्टाचार, मजहबी वैमनश्यता, अमीर-गरीब की खाई हमें सामान्य जीवन नहीं जीने दे रहीं। हर कोई कहीं न कहीं असंतुष्टि का भाव लिये जी रहा है। कुछ नया पाने की छटपटाहट इन संग्रहों के पन्नों में अंकित हैं।
आकाश में अर्धचंद्र (पंकज चतुर्वेदी), ‘रेख्ते के बीज’ (कृष्ण कल्पित), ‘सिर्फ़ वसंत नहीं’ (आशुतोष दुबे), ‘कतार में अन्तिम’ (कल्लोल चक्रवर्ती), ‘वाया नई सदी’ (श्रीप्रकाश शुक्ल), ‘मूर्तियों के जंगल में’ (सुभाष राय), ‘धूप में अलाव सी सुलग रही रेत पर’ (राजेंद्र नागदेव), समय ही ऐसा है (ब्रज श्रीवास्तव), किस किस से लड़ोगे (पंकज चौधरी), कथा का पृष्ठ (वीरेंद्र सारंग), पूर्वाभास (ओमप्रकाश मिश्र), नए मगध में (राकेश रेणु), ‘दुनिया का अंतिम घोषणापत्र’ (कमलजीत चौधरी), ‘लहू में लोहा’ (कुमार कृष्ण शर्मा) की कविताओं को पढ़ कर निश्चय ही आपको कई ऐसे विचार कौंधेंगे जो खुद ही हमारे मानस के किसी न किसी कोने में विद्यमान हैं।
अनामिका, सविता सिंह, सुमन केशरी तथा रंजना अरगड़े जैसी वरिष्ठ कवयित्रियों के संग्रह समय की आवाज हैं जिन्हें पाठकों का स्नेह मिला है।
युवा कवयित्रियों में जेसिंता केरकेट्टा (ईश्वर और बाजार), जोशना बनर्जी (अंबुधि में पसरा है आकाश), सुलोचना वर्मा (बचे रहने का अभिनय), अनुपम सिंह (‘मैंने गढ़ा है अपना पुरुष’), ऋतु त्यागी (मुझे पतंग हो जाना है) आदि के संग्रह संभावना के नये द्वार खोलते हैं।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कविता के मामले में यह वर्ष काफी समृद्ध रहा है।
3 वर्ष पहले
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