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बड़े बुज़दिल हैं लेकिन फिर भी हिम्मत कर रहे हैं, तुम्हारे शहर में रहकर मोहब्बत कर रहे हैं

हलचल
                
                                                         
                            वैलेंटाइन डे को ध्यान में रखते हुए इस बार ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें देश के कोने-कोने से जुड़ने वाले कवियों ने अपनी प्रेम कविताओं से कार्यक्रम को नई गरिमा प्रदान ही। इस बार का काव्य-कैफ़े प्रेम दिवस और श्रृंगार रस पर आधारित रहा। कार्यक्रम का लाइव प्रसारण अमर उजाला और अमर उजाला काव्य के फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल से किया गया।
                                                                 
                            
 
सुपरिचित कवि-गीतकार-आलोचक डॉ. ओम निश्चल ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया। उनके गीतों-कविताओं का एक खूबसूरत संग्रह 1987 में छपा और तब से कविता-गीत-ग़ज़ल सभी विधाओं में वे लगातार लिखते रहे हैं। हिंदी कविता के अथक पाठक-विश्लेषक एवं समालोचक होने के नाते वे पांच दशकों के हिंदी काव्य के सबसे विश्वसनीय एवं बहुपठित समीक्षकों में गिने जाते हैं।


 
डॉ. ओम निश्चल ने कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए, प्रेम गीतों पर दृष्टिपात करते हुए कार्यक्रम का आगाज किया। सबसे पहले उन्होंने सोनभद्र, उत्तर प्रदेश की कवयित्री कृति चौबे को कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया। जो श्रृंगार रस की कविताएं लिखती हैं और उन्मुक्त कंठ से तरन्नुम में गाती हैं। उनकी गीतों की बानगी देखिए—

“किसी की आंख से आंसू की बूंदें पोंछकर देखो
कभी ख़ुद को भुलाकर ख़ुद से आगे सोचकर देखो”


और वे आगे कहती हैं—

दिलों से छूट जाएंगी गिले शिकवे की हर गांठें
अदावत भूल जाओगे मोहब्बत सोचकर देखो 

 
कृति चौबे की अगली पंक्तियों ने समा बांधा—
 
पलक पर चांद जब आएगा, मेरी याद आएगी
समा गीतों का जब छाएगा, मेरी याद आएगी   


उनका एक और गीत
कोर कोर सपनों को रंगने वाले ओ मीत मेरे
जिसको मेरी साँसे दोहराती हैं ओ पावन गीत मेरे  

इसके बाद संचालक महोदय ने बहादुरगंज, फर्रुखाबाद के रहने वाले हैं, युवा शायर वासु पांडेय को आवाज दी गयी। ग़ज़ल उनकी विधा है। देश के बड़े-बड़े मुशायरों/कवि सम्मेलनों में उन्हें काव्यपाठ के लिए बुलाया जाता रहा है। उनकी कुछ पंक्तियां देखिए- 

“दिये केवल सजावट के लिये हैं
तेरे होने से घर में रौशनी है”
 
उनकी अगली ग़ज़ल की पंक्तियां देखिए—

“ बड़े बुज़दिल हैं लेकिन फिर भी हिम्मत कर रहे हैं हम
तुम्हारे शहर में रहकर मोहब्बत कर रहे हैं हम
अभी तक ठीक के आई नहीं है ग़ज़ल
पिछले सात जन्मों से रियाजात कर रहे हैं हम
तुम्हें कैसा लगेगा गर किसी पिंजरे में रख कर के
कोई तुमसे कहे "तेरी हिफ़ाज़त कर रहे हैं हम:

और यह भी
“यूँ भी कटने लगा हूँ अब मैं ग़ैर-मुनासिब यारों से
बारिश वफ़ा नहीं कर सकती मिट्टी की दीवारों से”

एक और शेर देखिए—
“दुखे हुये लोगों की दुखती रग को छूना ठीक नहीं
वक़्त नहीं पूछा करते हैं यारों वक़्त के मारों”

वासु की अगली मुक्तक देखिए –
ये कब कहते हैं कि आकर हमको गले लगा ले वो
मिल जाये तो रस्मनही बस हाथ मिला ले काफी है
इतने कहाँ नसीब के इससे प्यास बुझायें, खेल करें
दरिया हम जैसों को अपने पास बिठा ले काफी है    
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4 वर्ष पहले

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