ढाई करोड़ से अधिक पौधे लगा चुके प्रसिद्ध पर्यावरणविद् स्वामी प्रेम परिवर्तन की पुस्तक ‘पीपल की छाँव में’ का लोकार्पण एक अनूठे ढंग से ही किया गया। गुरुग्राम में अरावली एक जंगल में घनों पेड़ों के बीच पौधे लगाते हुए पुस्तक का लोकार्पण किया गया। इस पुस्तक का प्रकाशन पेंगुइन स्वदेश ने किया है। इस अवसर पर पेंगुइन और ‘गीव मी ट्रीज़’ की टीम ने मिलकर बड़ी संख्या में पौधे लगाए।
पीपल बाबा के नाम से चर्चित स्वामी प्रेम परिवर्तन का पेड़-पौधों के प्रति मोह किसी से छिपा नहीं है। पीपल बाबा ने अपना जीवन ही पेड़-पौधों के लिए समर्पित कर दिया है। वे देशभर में ढाई करोड़ से अधिक पौधे लगा चुके हैं। उन्होंने पेड़ लगाने की अपने जीवन की यात्रा को एक किताब की शक्ल दी है। लगभग 50 वर्षों की यात्रा को उन्होंने एक किताब की शक्ल दी है, जिसे पीपल की छाँव में नाम से प्रकाशित किया गया है।
विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर इस पुस्तक का लोकार्पण अरावली के जंगलों में किया गया। गीव में ट्रीज़ और पेंगुइन प्रकाशन की टीम ने मिलकर लगभग 100 पौधे लगाए।
इस अवसर पर पीपल बाबा ने पौधों के महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब आप कोई पौधा जमीन में रोपित करते हैं, तो आप केवल एक पौधा नहीं लगा रहे होते हैं, बल्कि एक नई दुनिया का निर्माण करते हैं। पौधा या कोई एक पेड़ अपने-आप में एक अलग और अद्भुत दुनिया होता है। किसी भी एक पेड़ पर असंख्य कीट-पतंगे पनपते हैं, नया संसार रचते हैं। पेड़ की जड़ों की भी दुनिया भी अलग होती है। वहाँ मिट्टी और करोड़ों-अरबों का कीटों का संसार होता है। पेड़ से किसी की यादें जुड़ी होती हैं तो किसी का पूरा जीवन ही चल रहा होता है।
पीपल बाबा ने कहा है कि आज हम आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। कुदरत की अनमोल धरोहर आज नष्ट होने के कगार पर है। केवल शिक्षा और जागरूकता ही पर्यावरण को बचा सकती है। हमें नए बच्चों को मिट्टी से जोड़ना चाहिए। उन्होंने पेड़-पौधों के महत्त्व के बारे में अवगत करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पीपल उद्देश्य केवल वृक्ष लगाना नहीं है, बल्कि लोगों के मन में प्रकृति के प्रति प्रेम, ज़िम्मेदारी और जागरूकता का बीज बोना है, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ एक संतुलित और हरित भविष्य का अनुभव कर सकें। पीपल के वृक्ष को लेकर अपने लगाव के बारे में उन्होंने कहा कि पीपल केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन, ऊर्जा और चेतना का स्रोत है। भारतीय परंपरा में इसकी विशेष आध्यात्मिक मान्यता रही है, जिसे पीपल बाबा आधुनिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
इस अवसर पर पेंगुइन प्रकाशन की प्रकाशक वैशाली माथुर सहित पेंगुइन की पूरी टीम मौजूद थी। ‘गीव मी ट्रीज़’ की ओर से अखंड दीक्षित, इस्तियाक अहमद और विशाल अहलावत सहित बड़ी संख्या में वॉलिंटियर उपस्थित थे।
पेंगुइन फॉरेस्ट
इस अवसर पर पीपल बाबा ने पेंगुइन फॉरेस्ट स्थापित करने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि वे हरियाणा सरकार ने मिलकर एक जगह चिह्नित करेंगे, जहाँ पेंगुइन फॉरेस्ट स्थापित किया जाएगा। इस फॉरेस्ट में पेड़ों के बीच पुस्तकों का अनूठा संयोजन होगा। यहाँ प्रकाशक, पुस्तक प्रेमी और पर्यावरण प्रेमी मिलकर संवाद करेंगे।
पुस्तक के बारे में
'पीपल की छांव में' स्वामी प्रेम परिवर्तन की आत्मकथा है। वे भारत के सबसे सम्मानित पर्यावरण संरक्षणकर्ताओं में से एक हैं। यह पुस्तक उनके हस्तलिखित नोट्स, डायरियों, अख़बारों के हाशियों, नैपकिनों और कागज़ के बिखरे हुए टुकड़ों पर दर्ज स्मृतियों से आकार लेती है। इन संस्मरणों के माध्यम से पाठक देहरादून की गलियों और पुणे की हरियाली से भरी छावनी में पहुँचता है, जहाँ दो असाधारण महिलाओं—उनकी नानी और एक स्कूल टीचर—ने उनके भीतर जिज्ञासा, संवेदनशीलता और जीवन के प्रति सम्मान का वह बीज बोया, जिसने आगे चलकर उन्हें पीपल बाबा बनाया।
भारत के 220 से अधिक जिलों की यात्राओं के दौरान उन्हें यह गहरा बोध होता है कि पेड़ों पर भूतों की उनकी नानी की कहानियाँ दरअसल प्रकृति संरक्षण की लोक-ज्ञान पर आधारित शिक्षाएँ थीं। वे इस सत्य को समझते हैं कि आस्था किस प्रकार वनों की रक्षा करती है, और कैसे महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि श्रद्धा और निस्वार्थ सेवा से किए गए छोटे-छोटे कार्य लाखों लोगों को
एक ऐसे आंदोलन से जोड़ सकते हैं, जिसका न कोई औपचारिक ढाँचा होता है और न कोई घोषित नाम।
ईमानदार, आत्मीय और भीतर तक परिवर्तनकारी यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि धरती की आवाज़ सुनना हम भूले नहीं हैं; मिट्टी की कहानियों को समझना अभी भी संभव है। पेड़ की छाया में प्रेम को महसूस करना और उसकी पत्तियों की सरसराहट में कविता सुन लेना आज भी हमारी सहज मानवीय क्षमता है।
यह पुस्तक केवल एक व्यक्ति की जीवन-यात्रा नहीं, बल्कि प्रकृति, आस्था और मानवीय करुणा के बीच गहरे संबंधों की एक प्रेरक कथा है।
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