हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर लेखक व पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार गिरिराज किशोर का रविवार सुबह कानपुर स्थित निवास पर निधन हो गया। कथा, नाटक, आलोचना व उपन्यास में वह समान रूप से हस्तक्षेप रखते थे। गिरिराज किशोर को उनके उपन्यास 'पहला गिरमिटिया' से विशेष पहचान मिली। यह उपन्यास महात्मा गांधी के अफ़्रीका प्रवास पर आधारित था। इसके अलावा उपन्यास 'ढाई घर' भी अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था, इसी उपन्यास को सन् 1992 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया था।
गिरिराज किशोर का जन्म 8 जुलाई 1937 को मुजफ़्फ़रनगर में हुआ था। ज़मींदार पिता के बेटे ने बहुत ही कम उम्र में घर छोड़ दिया था । वह स्वतंत्र रूप से पत्रिकाओं व अख़बारों के लिए लिखने लगे, उनसे मिले रूपयों से ही उनका खर्चा चलता था। सोशल वर्क में मास्टर होने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में सेवायोजन अधिकारी व प्रोबेशन अधिकारी के तौर पर काम किया। इसके बाद 2 साल तक वह पूर्ण रूप से लेखन के क्षेत्र में रहे। 1966 से 1975 तक वह कानपुर विश्वविद्यालय में सहायक और उपकुल सचिव रहे। वर्ष 1975 से 1983 तक वे आईआईटी कानपुर में कुलसचिव भी रहे जहां उन्होंने रचनात्मक लेखन केंद्र की स्थापना की और 1997 में सेवानिवृत्त हो गए। नौकरी के दौरान भी गिरिराज किशोर ने अपने लेखन के कार्य को नहीं छोड़ा।
उनकी लिखी प्रमुख रचनाओं में लोग, चिड़ियाघर, जुगलबंदी, तीसरी सत्ता, दावेदार,यथा-प्रस्तावित, इन्द्र सुनें, अन्तर्ध्वंस, परिशिष्ट, यात्रायें, ढाईघर (उपन्यास) के अलावा दस कहानी संग्रह, सात नाटक, एक एकांकी संग्रह, चार निबंध संग्रह तथा महात्मा गांधी की जीवनी 'पहला गिरमिटिया' प्रकाशित रूप में सामने हैं।
पहला गिरमिटिया गांधी जी के साथ इस तरह जुड़ गया कि जहां भी महात्मा की बात होती वहां इस उपन्यास का ज़िक्र ज़रूर होता था। गिरिराज किशोर का लिखा हर उपन्यास एक दूसरे से भिन्न है। उनके हर नए उपन्यास के साथ ही साहित्यकार के तौर पर उनका क़द भी बढ़ा होता गया। विशेष तौर पर गिरमिटिया के बारे में उनका कहना है कि "आईआईटी का अनुभव गिरमिटिया लिखने में बहुत काम आया। मैं उस स्थिति को समझ सका जिसने एक साधारण व्यक्ति को महात्मा गांधी बना दिया।" इस उपन्यास के लिए उन्हें सन् 2007 में भारत सरकार की ओर से पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
गिरिराज किशोर ने न सिर्फ़ महात्मा पर बल्कि कस्तूरबा गांधी पर आधारित 'बा' उपन्यास भी लिखा। इसमें उन्होंने पत्नी के रूप में एक स्त्री का स्वयं और देश की आज़ादी के आंदोलन से जुड़े दोहरे संघर्ष के बारे में बताया है।
गिरिराज किशोर हिंदी की स्थित को लेकर भी बेहद चिंतित रहते थे। वह चाहते थे कि हिंदी भाषा के लिए कोई एक दिन तय न हो बल्कि इसके प्रसार के लिए और भी कदम उठाए जाएं।
गिरिराज किशोर को लेखन के लिए हिंदी संस्थान उत्तर प्रदेश का भारतेन्दु पुरस्कार, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का वीरसिंह देव पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी सम्मेलन द्वारा वासुदेव सिंह स्वर्ण पदक, साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान, महात्मा गांधी सम्मान, व्यास सम्मान, जनवाणी सम्मान, हिंदी सेवा न्यास सम्मान शामिल है।
हिंदी के इस वट-वृक्ष के निधन से सम्पूर्ण साहित्य जगत् में शोक व्याप्त है।
कमेंट
कमेंट X