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‘ओ गंगा बहती रहना’ का ‘गंगा उत्सव’ में किया गया विमोचन

o ganga bahati rahna ka ganga utsav mein kiya gaya vimochan
                
                                                         
                            नमामि गंगे और जल शक्ति मंत्रालय के वार्षिक आयोजन ‘गंगा उत्सव’ में गंगा को कविताओं के माध्यम से बेहद रोचक तरह से बयां करती प्रज्ञा तिवारी की कॉफी टेबल बुक ‘ओ गंगा बहती रहना’ का विमोचन गजेन्द्र सिंह शेखावत, माननीय जल शक्ति मंत्री, भारत सरकार के हाथों किया गया। 
                                                                 
                            

गजेन्द्र सिंह शेखावत, माननीय जल शक्ति मंत्री, भारत सरकार के शुभ संदेश से इस पुस्तक की प्रस्तावना राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, भारत सरकार के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा ने लिखी है।

'ओ गंगा बहती रहना' प्रज्ञा तिवारी का दूसरा काव्य संग्रह व चौथी पुस्तक है। साहित्य के विविध विधाओं में पारंगत प्रज्ञा तिवारी की इससे पहले ‘कभी सोचा है’ नामक कविता-संग्रह, ‘दोस्ती प्यार यार’ नामक बेहद लोकप्रिय उपन्यास तथा ‘रेणु प्रसंग’ नामक आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी हैं। गंगा और उसके तटों पर मानव मन द्वारा बिताए हर पल, हर बेला और हर अनुभूति को समेटती किताब, ‘ओ गंगा बहती रहना’ गंगा की बेहतरीन कविताओं को अपने अंक में सहेजे है और गंगा के विभिन्न पहलुओं को रेखांकित करती है मसलन यात्रा, विचार, अनुभूति, कला, आध्यात्म।

प्रस्तावना में राजीव रंजन मिश्रा लिखते हैं, “‘ओ गंगा बहती रहना’ - सुश्री प्रज्ञा तिवारी की यह पुस्तक गंगा के प्रति हमारी अनुभूतियों और इसके आध्यात्मिक महत्व के सर्वोत्तम विलय का प्रतीक है। मनोरम दृश्यांकन के साथ गंगा तट पर उमड़ते-घुमड़ते सभी प्रकार के विचारों व भावों को शाब्दिक रूप देतीं मधुरिम कविताओं का यह संकलन गंगा के साथ हमारे सांस्कृतिक, भावनात्मक संबंधों को तो उजागर करता ही है, नदी से जुड़ी पौराणिक कथाओं का भी परिचय देता चलता है और इस प्रकार पाठकों में गंगा-पर्यटन संबन्धित जिज्ञासा भी जगाता है।”
कवियित्री अपनी भूमिका में कहती हैं, “गंगा की यह विशेषता है, एक पल में आपको इस दुनिया से जोड़ देगी और अगले ही पल आप इस दुनिया में रहते हुए भी कहीं और के हो जाएँगे।”

यही काम करती है दिलचस्प दिखती हिन्दी की यह कॉफी टेबल बुक भी – आप जहाँ भी बैठे हों, आपको वहाँ से सीधा गंगा के तटों पर ले जाती है। हर कविता अपने भाव और शब्दों से एक यूनिक माहौल बनाती है। हर कविता आपको रोककर अपने पास रखती है। आप उसी पन्ने पर बने रहकर उस कविता को पूरी तरह जीते भी रहना चाहते हैं और आपको अगले पन्ने को एक्सप्लोर करने की इच्छा भी होती है। अधिकतर कविताएँ 7-8 पंक्तियों की छोटी कविताएँ हैं:

“जब मन के वक्र विचारों को मन ही कर पाता है न व्यक्त
जब सजी धजी इस दुनिया में पाता मन को मैं परित्यक्त
जब रागरहित, वैराग्ययुक्त मन फिरता मुझसे ही विरक्त
तब काशी तेरी गंगा का ये तट करता मुझे अभिव्यक्त”

 
कुछ कविताएँ छंदमय हैं, कुछ छंदमुक्त। प्रज्ञा तिवारी की अधिकांश किताबों की तरह ‘ओ गंगा बहती रहना’ में भी सहज प्रवाह है परंतु इस सहजता में भी भाषा और भाव का गाम्भीर्य है। पहली कविता का एक अंश है:
“कहीं अतुकांत-सी बहती हो
कहीं छोर नहीं, कोई ओर नहीं
कहीं बहती हो हर तुक में तुम
हर शब्द, अर्थ का भाव लिए।
गंगा तुम स्वयं वो कविता हो
जिसमें कविता का अर्थ मिले।।”


‘ओ गंगा बहती रहना’ कविताओं द्वारा हमारी गंगा-यात्रा तो कराती ही है, बीच-बीच में गंगा से जुड़े स्थलों के आध्यात्मिक महत्व को भी बताती चलती है। कुल मिलाकर प्रज्ञा तिवारी की यह किताब हर ट्रैवेलर और गंगा प्रेमी की कॉफी टेबल पर रखी जाएगी। यह पुस्तक पुस्तकनामा से प्रकाशित है।
 
4 वर्ष पहले

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