अक्टूबर महीना साहित्य प्रेमियों के लिए विशेष महत्व रखता है। वे उत्सुकता से इंतजार करते हैं साहित्य के नोबेल पुरस्कार की घोषणा का। हर साल की तरह अनुमानों का बाजार खूब गर्म था। मगर 2021 के लिए जिसके नाम की घोषणा नोबेल समिति ने की उसके नाम का दूर-दूर तक नामो-निशान न था। कई बार उसके निर्णय पर सवाल खड़े हुए हैं। इस साल का चुनाव नोबेल समिति के निर्णय के प्रति विश्वास मजबूत करने वाला है। इस साल का साहित्य का नोबेल पुरस्कार जंजीबार में जन्मे और इंग्लैंड में रह रहे अब्दुलरज़ाक गुरनाह को दिया गया है। 1996 के बाद यह किसी अश्वेत लेखक को मिला है। 1996 में यह अमेरिकी अश्वेत लेखिका टोनी मॉरीसन को प्राप्त हुआ था। इस बीच नोबेल समिति ने किसी अन्य अश्वेत लेखक को इस पुरस्कार के योग्य नहीं समझा जबकि न्युगी व थियांग’ओ एक लंबे समय से पाठकों तथा समीक्षकों के हिसाब से इसके दावेदार रहे हैं। 2017 में जब इंग्लैंड के कज़ारो इशिगुरो को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था तब समिति की खूब आलोचना हुई थी और जब 2005 में इंग्लैंद के ही नाटककार हेरॉल्ड पिंटर को यह मिला तब भी कहा गया कि यह लेखन के लिए नहीं वरन लेखक के राजनैतिक विचारों को मिला है। इस बार लगता नहीं है कि ऐसा कोई आरोप नोबेल समिति पर लगेगा। इस बार अब्दुलरज़ाक गुरनाह को चुन कर समिति ने कई वर्षों से लग रहे आरोपों (बॉब डिलेन, स्वेतलना एलेक्सीविच आदि के चुनाव पर) का प्रच्छालन किया है।
इस वर्ष नोबेल समिति ने उपनिवेशवाद के खिलाफ़ समझौता न करने वाले और बुराई के खिलाफ़ अपने साहित्य के द्वारा प्रहार करने वाले अब्दुलरज़ाक को इस पुरस्कार से नवाजा है। नोबेल समिति ने अपनी अनुशंसा में कहा है कि अब्दुलरज़ाक संस्कृति के विस्तार के हिमायती रहे हैं। उन्होंने अपने लेखन में बिना समझौते के महाद्वीपों और सांस्कृतियों के गह्वर में रहने वाले शरणार्थियों की नियति को करुणापूर्ण, गहन सूझ और पैनी दृष्टि के साथ उकेरा है। वे अपनी कलम के द्वारा उपनिवेशवाद की बुराई और उसके प्रभाव को दिखाने का प्रयास करते हैं।
अब्दुलरज़ाक गुरनाह का जन्म 1948 में हिन्द महासागर के ज़ंज़ीबार द्वीप में हुआ। पिछली सदी के साठ के अंत में वे एक शरणार्थी के रूप में इंग्लैंड में आ बसे। पुरस्कार की घोषणा के समय वे इंग्लैंड के निवासी हैं। शरणार्थियों का दु:ख-दर्द उन्होंने भोगा है और वह उनके साहित्य में आता है। आप उनकी जीवनयात्रा की झलक उनके लेखन में देख सकते हैं। आज इतनी उम्र होने के बावजूद वे लेखन में रत हैं। सेवा निवृति के पूर्व वे केंटरबरी की केंट यूनिवर्सिटी में इंग्लिश, खासकर उत्तर औपनिवेशिक साहित्य पढ़ा रहे थे। शिक्षण में उनका खास क्षेत्र वोल सोयेन्का, न्युगी व थिओन्ग’ओ तथा सलमान रुश्दी जैसे लेखकों की रचनाओं पर रहा है।
दिसम्बर 1963 में ब्रिटिश उपनिवेश शासन से ज़ंज़ीबार ने शांतिपूर्ण स्वतंत्रता हासिल की परंतु तत्काल वहाँ दमन और शोषण का चक्र चला। अरब मूल के नागरिकों पर अत्याचार का पहाड़ टूट पड़ा। दुर्भाग्य या सौभाग्य से अब्दुलरज़ाक गुरनाह का जन्म इसी नस्ल समूह में हुआ है जिसका उस समय कत्लेआम हो रहा था। अत: वे मात्र 18 वर्ष की उम्र में नवनिर्मित रिपब्लिक ऑफ़ तंजेनिया छोड़ कर इंग्लैंड पलायन को मजबूर हुए। 1984 से पहले उनके लिए ज़ंज़ीबार वापस लौटना और अपने पिता को देख पाना संभव न था।
स्वाहिली उनकी मातृभाषा है लेकिन उन्होंने 21 वर्ष की उम्र से इंग्लिश में लिखने का निर्णय किया। हालाँकि उनकी प्रारंभिक रचनाएँ स्वाहिली में हैं मगर आज वे उसे अपने साहित्यिक कार्य में शुमार नहीं करते हैं। उनके पूरे लेखन का कथानक शरणार्थी जीवन की टूटन है। अब्दुलरज़ाक ने दस उपन्यास तथा कई कहानियाँ लिखी हैं। ‘मेमोरीज ऑफ़ डिपार्चर’, ‘पिलग्रिम्स वे’, ‘पैराडाइज’, ‘एडमाइरिंग साइलेंस’, ‘बाई द सी’, ‘डेजर्शन’, ‘द लास्ट गिफ़्ट’, ‘ग्रेवल हार्ट’, ‘आफ़्टरलाइफ़्स’ तथा ‘डॉटी’ इंग्लिश में उनके सब उपन्यास उपलब्ध हैं। ‘द कलैक्टेड स्टोरीज ऑफ़ अब्दुलरज़ाज गुरनाह’ शीर्षक से उनकी कहानियों का संकलन प्रकाशित है। साथ ही उन्होंने ढ़ेर सारा साहित्येत्तर लेखन किया है तथा उनके भाषण भी प्रकाशित हैं।
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