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विस्मृत उपस्थिति का पुनः उद्घाटन है नीलकुरिंजी

हलचल
                
                                                         
                            भारत मंडपम में आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले में डॉ गीता शर्मा द्वारा संपादित कहानी संग्रह नीलकुरिंजी का विमोचन 10.1.2026 को किया गया। इस अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार कमल कांत शर्मा महा निरीक्षक(सेवा निवृत्त ), कवियत्री डॉ सुभाषिनी शर्मा, श्वेतवर्णा प्रकाशन की महा प्रबंधक शारदा सुमन जी सहित कई गणमान्य लोगों की उपस्थिति रही।
                                                                 
                            

हिंदी साहित्य में दिव्यांगता विमर्श को प्रभावी ढंग से स्थापित करने हेतु कृत संकल्पित होकर प्रयासरत हैं ताकि किसी भी तरह की विकलांगता से जूझ रहे लोग प्रेरित होकर समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें, इनकी समस्याएं ,इनके संघर्ष, इनकी पीड़ा इनकी आवाज़ बन समाज तक पहुंच सके और एक संवेदनशील और समावेशी वातावरण का निर्माण हो सके।

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार से सम्मानित डॉ गीता शर्मा अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापक हैं और वर्तमान में माता जीजाबाई शासकीय स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय इंदौर में कार्यरत हैं।उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित और पुरस्कृत हो चुकीं हैं जिसमें प्रमुख हैं।
 
' नीलाभ हुआ है प्रेम रंग' काव्य संग्रह

' मुड़ कर देखो मुझे' कहानी संग्रह
(दिव्यांगता विमर्श केंद्रित)

'कुकनुस ' पुनर्नवा,नीलकुरिंजी 
संपादित कहानी संकलन 
(दिव्यांगता विमर्श केंद्रित)

नीलकुरिंजी के बारे में वे बताती हैं कि नीलकुरिंजी का बारह वर्षों में एक बार खिलना मात्र एक वनस्पतिक घटना नहीं, बल्कि प्रतीक्षा, अदृश्यता और पहचान का जीवंत प्रतीक  है। नील कुरिंजी का खिलना, किसी विस्मृत उपस्थिति का पुनः उद्घाटन है।

यह  संकलन हिंदी साहित्य और विशेषकर दिव्यांगता विमर्श केंद्रित साहित्य के लिए एक महत्त्वपूर्ण संग्रह है। वे मानती हैं कि हिन्दी साहित्य को विकलांगता विमर्श की दृष्टि से पुनर्पाठ करने की आवश्यकता है।

साहित्य में विमर्श का उद्देश्य उन अनुभवों, पीड़ाओं और सवालों को सामने लाना है, जिन्हें लंबे समय तक दबाया या नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। साहित्य में विमर्शों की उपस्थिति इसे एक संवेदनशील और जागरूक साहित्य बनाती है। विमर्श न केवल शोषित वर्गों को स्वर देते हैं, बल्कि समाज में न्याय, समानता और मानवता की स्थापना की दिशा में साहित्य की सक्रिय भूमिका को भी दर्शाते हैं।

नीलकुरिंजी में  हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित कहानीकारों मृदुला गर्ग , वर्षा अदालजा, चंद्र किशोर जायसवाल, चित्रा मुद्गल, सूर्यबाला, मैत्रेई पुष्पा, ममता कालिया, महेश कटारे, गोपाल माथुर,दीपक शर्मा, रत्न कुमार ,आशा पाण्डेय,मीनाक्षी स्वामी,ज्योत्सना मिश्रा, वंदना बाजपेई और सरिता कुमारी की दिव्यांगता के इर्द गिर्द घूमती कहानियां हैं।

ये कहानियां न सिर्फ समाज को दिव्यांगों के प्रति संवेदनशील और सजग करती हैं बल्कि दिव्यांगता से जूझ रहे व्यक्तियों में भी साहस गरिमा और प्रेरणा का संचार करती हैं। क्योंकि विकलांगता कोई अभिशाप या दुर्भाग्य नहीं, बल्कि एक अलग जीवन अनुभव है। यह विमर्श विकलांग व्यक्तियों को सशक्त नागरिक के रूप में स्थापित करने की ओर एक सशक्त कदम है। इसके माध्यम से हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जहाँ हर व्यक्ति को उसकी क्षमताओं के अनुसार सम्मान और अवसर मिले।यह केवल विकलांग व्यक्तियों की बात नहीं करता, बल्कि समाज को बेहतर और अधिक मानवीय बनाने की दिशा में कार्य करता है।

नोट विश्व पुस्तक मेले में हॉल 
2- 3 के स्टॉल नंबर 05 पर श्वेतवर्णा प्रकाशन पर मिलेगी नीलकुरिंजी
8 महीने पहले

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