वर्ष 2018 की श्रेष्ठ कृतियों के लिए शब्द सम्मानों की घोषणा भी कर दी गई। 'छाप' श्रेणी में कथा (उपन्यास) वर्ग में ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास 'पागलखाना', को शब्द सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। पेशे से चिकित्सक लेकिन साथ-साथ समय और समाज को अपनी दृष्टि से देखने और उन अऩुभूतियों को कलम के जरिए साधने वाले ज्ञान चतुर्वेदी वर्तमान में व्यंग्य विधा के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।
उनके व्यंग्य की धार इतनी तीखी है कि पाठकों को अपनी ओर सिर्फ हास्य के जरिए खींचती ही नहीं, बल्कि हास्य और व्यंग्य में छुपे व्यवस्था की सच्चाई से भी रू ब रू करवाती है, व्यवस्थाजनित विसंगतियों और समाज के हृदय में चुभती है। व्यंग्य जरिए वे समय, समाज और राजनीति ही नहीं बल्कि संपूर्ण सामाजिक परिवेश का शब्दचित्र उकेर देते हैं।
ज्ञान चतुर्वेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के मऊरानीपुर में 2 अगस्त, 1952 को हुआ। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी चिकित्सकीय तालीम के दौरान सभी विषयों में अव्वल थे और उनमें स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया। भारत सरकार के संस्थान बीएचईएल के चिकित्सालय में तीन दशक से ऊपर उन्होंने अपनी सेवाएं दीं।
70 के दशक में 'धर्मयुग' से लेखन की शुरुआत हुई। व्यंग्य से लबरेज 'नरक यात्रा' ज्ञान जी का पहला उप्नयास था जो बहुत चर्चित हुआ। इसके बाद 'बारामासी' 'मरीचिका' और 'हम न मरब' जैसे उपन्यास प्रकाशित और चर्चित हुए।
देश के कोने-कोने से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों और इंटरनेट की दुनिया में उनके व्यंग्य प्रकाशित होते रहते हैं। 2002 में अपने उपन्यास 'बारामासी' के लिए यू.के. कथा सम्मान से सम्मानित किये गये। भारत सरकार ने साल 2015 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। इसके अलावा ज्ञान जी को 'शरद जोशी सम्मान' से भी सम्मानित किया जा चुका है। उनकी 'जो घर फूँकें', 'अलग' जैसी कृतियां भी चर्चित रही हैं।
'पागलखाना' ज्ञान चतुर्वेदी का यह पाँचवाँ उपन्यास है। एक व्यंग्यकार के रूप में वह अपनी औपन्यासिक कृतियों के जरिए समाज और समय को देखने का एक आलोचनात्मक नजरिया देते हैं, उसके बारे में अलग से कुछ कहने का कोई औचित्य नहीं है।
हिन्दी के पाठक उनके 'नरक-यात्रा', 'बारामासी', और 'हम न मरब' जैसे उपन्यासों के आधार पर जानते हैं कि उन्होंने अपनी औपन्यासिक कृतियों में सिर्फ व्यंग्य का ठाठ ही खड़ा नहीं किया, न ही किसी भी कीमत पर पाठक को हंसाकर अपना बनाए का प्रयास किया, उन्होंने व्यंग्य की नोक से अपने समाज और परिवेश के असल नाक-नक्श उकेरे। इस उपन्यास में भी वे यही कर रहे हैं।
जैसा कि उन्होंने भूमिका में विस्तार से स्पष्ट किया है यहाँ उन्होंने बाजार को लेकर एक विराट फैंटेसी रची है। यह वे भी मानते हैं कि बाजार के बिना जीवन संभव नहीं है। लेकिन बाजार कुछ भी हो, है तो सिर्फ एक व्यवस्था ही जिसे हम अपनी सुविधा के लिए खड़ा करते हैं। लेकिन वही बाजार अगर हमें अपनी सुविधा और सम्पन्नता के लिए इस्तेमाल करने लगे तो? आज यही हो रहा है। बाजार अब समाज के किनारे बसा ग्राहक की राह देखता एक सुविधा-तन्त्र भर नहीं है। वह समाज के समानान्तर से भी आगे जाकर अब उसकी सम्प्रभुता को चुनौती देने लगा है।
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6 वर्ष पहले
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