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गगन गिल की कविताएं स्त्री मन की पीड़ा को उद्घाटित करती हैं...

गगन गिल
                
                                                         
                            वर्ष 2018 की श्रेष्ठ कृतियों के लिए शब्द सम्मानों की घोषणा भी कर दी गई। 'छाप' श्रेणी में कविता वर्ग में गगन गिल के संग्रह ‘मैं जब तक आई बाहर’ को चुना गया है। दशक भर से ज्यादा अंतराल पर उनकी कविताओं का नया संग्रह ‘मैं जब तक आई बाहर’ प्रकाशित हुआ है। गगन गिल की कविताओं ने हिंदी कविता को एक नया मुहाबरा और नई समझ दी है।  कविता संग्रह ‘मैं जब तक आई बाहर’ वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। 
                                                                
                
                
                 
                                    
                     
                                             
                                                

गगन गिल ने कविता में अपने ज़िम्मे जो काम लिया है, वह है स्त्री की पारम्परिक नियति को उद्घाटित करना। गगन स्त्री के दुखों और उदासियों को रचने वाली कवयित्री हैं। समाज की भयावह सच्चाइयां गगन गिल के यहां कविता के रूप में ढलती हैं जिससे पाठकों का सामना होता है। 

दु:खों और उदासियों के अलावा गगन की कविताओं भारतीय चिंतन परंपराओं की भी गूंज भी सुनाई पड़ती है। उनकी कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है- बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
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6 वर्ष पहले

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