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Drama Patloon: भगवान को 'संघर्ष से सफलता' की ओर ले जाता नाटक 'पतलून'

drama patloon tells about the story of a fifty years old man bhagwan
                
                                                         
                            

रंगमंच एक ऐसा माध्यम है, जो हमारे जीवन में रंग लेकर आता है। जब जीवन में रंग होते हैं तो हम अपना मक़सद तय कर पाते हैं फिर वो मक़सद ही मंज़िल की तरफ़ ले जाता है, पतलून एक ऐसा ही नाटक है। जिसका मुख्य किरदार 'भगवान' 50 साल शोषण झेल कर, जब उसे ज़िंदगी में एक मक़सद मिलता है तो उस मक़सद को पूरा करने के लिए असाधारण तरीके से मेहनत करता है और सीख देता है कि चाहे जो हो अपने लक्ष्य से हर बार कहो 'एक बार कहो तुम मेरे हो…' और एक दिन उस लक्ष्य को, हकीकत में अपना बना लो …उसके लिए जियो, और एक दिन उसे हमेशा के लिए कमा लो।

'परिवर्तन समूह' और 'अभिनायक रंगमंच' के सहयोग से नाट'पतलून' श्री मनीष जोशी 'बिस्मिल' जी द्वारा लिखित एक हिंदी नाटक है। जिसकी निर्देशिका रीतिका मलहोत्रा है। गीतों की कंपोजिशन 'साधो बैंड' और 'अयाज़ खान' के द्वारा किया गया है। नाटक का मुख्य किरदार 'भगवान' को वंशज सक्सेना ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया है।

इसी नाटक की निर्देशिका 'रितिका मल्होत्रा' से 'अंकित कुमार गोयल' की बातचीत के अंश...

पतलून नाटक के बारे मैं बताएं?
नाटक पतलून मनुष्य के संघर्षों के आगे उसका अथक प्रयासों के साथ सामना करना और लक्ष्य प्राप्ति के लिए सर्वस्व समर्पित करना, ये दो महत्वपूर्ण संदेश देती है।

नाटक का मुख्य किरदार भगवन का क्या संघर्ष हैं?
भगवान 50 साल ईट भट्ठे में बंधुआ मजदूर बनकर शोषण झेलने के बाद, वहां से आज़ाद होकर, आगे का गुजारा करने के लिए बूट पॉलिश का काम शुरू करता है, जहां पॉलिश का तजुर्बा न होनें के कारण उससे किसी की पतलून पर पॉलिश लग जाती है, और वो व्यक्ति उसे जीवन में एक पतलून खरीद कर दिखाने के लिए कहता है क्योंकि पतलून एक स्टेटस सिंबल के तौर पर दिखाई जाती है। भगवान दृढ़ निश्चय करता है की बची खुची ज़िंदगी में और कुछ बने या न बने एक पतलून तो वो अपने पैसे से बनाएगा…

जो लोग अभिनय मैं आने की सोच रहे हैं उनको नाटक किस दृष्टिकोण से देखना चाहिए?
उन्हें ये समझना होगा की क्या उनके अंदर बस हीरो बनने का जज़्बा है या सच में अभिनेता पहले बनना चाहते हैं,यूं तो सभी के अंदर जुनून है किसी न किसी लक्ष्य का, यानी हर किसी में एक भगवान है और हर किसी की एक पतलून है। यदि वो लोग जो इस अभिनय क्षेत्र में आना चाहते हैं अपने अंदर भगवान के किरदार को अभिनय नामक पतलून के लिए और उसको सीखने के लिए किए गए तमाम संघर्षों के लिए तैयार पाते हैं तो उन्हें अभी से शुरू कर देना चाहिए।

जब रंगमंच की बात होती है तो लोगों के जहन मैं अभिनय ही होता है, अभिनय से अलग और कोन कोन से संकाओ का योगदान होता है?
अब तो फिर भी कुछ सुधार है लेकिन आज भी कुछ घरों में हर बार जब भी कोई व्यक्ति अपने परिवार में अभिनेता बनने का विचार साझा करता है तो शुरुआती दौर में उसकी इस बात को सिर्फ शौक समझ कर ज्यादा गंभीरता से नहीं देखा जाता। मैं ये मानती हूं के ये बहुत ही संदेहयुक्त (uncertain) है परंतु ऐसे तो हर दिन का हिसाब है। हमें नहीं पता की हम जो कर रहे हैं आज उसका भविष्य कितना देख पाएंगे। पर संयम के साथ पंक्ति में लगे रहने पर एक दिन नंबर जरूर आयेगा। और हां, जैसा की अक्सर एक्टर बनने के ख्वाब लिए अक्सर एक व्यक्ति को उसके रिश्तेदार अक्सर कर कर के दिखाने के लिए घर में कहा जाता है उस पर यही कहूंगी जैसे ऑपरेशन की असली जगह अस्पताल है वैसे ही अभिनय का असली स्थान रंगमंच व सिनेमा है…और ये तमाम प्रश्न लड़का और लड़की दोनों के साथ होते है ।

इस नाटक की रिहर्सल मैं कितना समय लगा?
लगभग 3 महीने, सबसे पहले केवल रीडिंग, फिर किरदारों का चयन, फिर ब्लॉकिंग और इमोशंस के साथ कुछ गीतों की कंपोजिशन के समावेश के साथ इसे नाटक के रूप में तैयार किया गया।

इस नाटक की रिहर्सल करते समय कुछ ऐसा अनुभव जो आप पाठक को बताना चाहती हैं?
बस कभी न थकने वाला भगवान जब एक जादूगर से बेवकूफ बन अपनी जीवन भर की जोड़ी पाई पाई खो देता है और बावजूद इसके वापिस खड़ा होने का संकल्प लेता है तो खुद भी वैसे 100 गुलफाम (जादूगरों) का सामना करने का सामर्थ्य महसूस करती हूं।

आजकल जब मनोरंजन के लिए ओटीटी और मोबाइल मैं बहुत विकल्प मौज़ूद है, तो आप रंगमंच (थियेटर) को कैसे देखती हैं?
हर चीज की अपनी जगह है, सिनेमा एक अलग विधा है, नाटक बिल्कुल अलग। थिएटर एक ही ज़िंदगी को कई बार जीने एवम उस किरदार की गहराइयों को इमेजिनेशन के तौर पर जीने का मौका देती है वो भी बिना किसी रीटेक के, सिनेमा में सुविधाओं और रीटेक का अभाव नहीं। पर जब दर्शक आपके सामने आपकी कल्पना को महसूस कर एक अदृश्य cord से जुड़ कर आपके साथ हंसता रोता है तो नाटक की जीवंतता आपको थोड़ा और थिएटर से जोड़ती चली जाती है।

नाटक का मंचन कब, समय और कहाँ होगा?
17 अगस्त, 2023, गुरुवार को एल. टी.जी सभागार, कोपरनिकस मार्ग, मंडी हाउस में होगा ठीक सांय 7 बजे (प्रवेश 06:30 से आरंभ)

 

3 वर्ष पहले

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