अनुगूँज साहित्यिक संस्था ने एक बार फिर सामाजिक जागरूकता हेतु कुछ सफल कार्यक्रमों का ऑनलाइन आयोजन किया। दिनांक 11 सितंबर, 2020 को साक्षरता और आत्महत्या की रोकथाम जैसे विषयों पर अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम बेहद सफल और स्तरीय रहा।
हिंदी के साथ कुछ अंग्रेजी की कविताएं भी पढ़ी गईं। अमेरिका से मधु खरे, मंजू श्रीवास्तव, इंदु मैत्रा, यू.ए.ई. से देवप्रिया सिंह और भारत से ग्यारह कवि-कवयित्रियों ने सफलतम प्रस्तुतियां दीं। देश के प्रसिद्ध गीतकार डॉ. रामगोपाल भारतीय और देश की जानी मानी कवयित्री संध्या सिंह (मुख्यअतिथि) और संजय जैन (विशिष्ट अतिथि) के दक्ष संचालन, साथ ही मधुर स्वर की मल्लिका रश्मि प्रभाकर, संवेदनशील कवयित्रियां, निवेदिता श्रीवास्तव, रंजना पांडेय, खुशबू गोयल, कुमुद रंजन झा,संयोजिका निवेदिता चक्रवर्ती व देश के जाने माने कवि राजीव कपिल, रमेश चारण की गरिमामय उपस्थिति से महफ़िल गूंज उठी।
'आत्महत्या रोकथाम' जैसे विषय पर डॉ. रामगोपाल भारतीय (मेरठ) की इन पंक्तियों ने आशा का संचार किया-
तेरे रोने सें ग़म कम न हो पाएंगे,
यूं न आंखों से आंसू बहाया करो।
बुझ गए जो दिए वो भी जल जाएंगे,
तुम अंधेरों में भी मुस्कराया करो।
अनुगूँज ऑनलाइन काव्यगोष्ठीPC: Internet
कुमुद रंजन झा की ये पंक्तियां अंतर्मन को झकझोर गईं-
माना कि हजार वजहें रही होंगी,
जीवन को अलविदा कहने की
पर कोई तो एक वजह होगी ना
इस प्यारे से जीवन को फिर से गले लगाने की
संजय जैन की ये पंक्तियां कमाल की थीं-
जहां में कौन है भला, जो दर्द से भरा नहीं
जिया वही है शान से, किसी से जो डरा नहीं
संध्या सिंह की ये पंक्तियां आत्महत्या की भावना को सीधे -सीधे हतोत्साहित करती हैं-
नहीं मिलेगा रूह को, सदियों सदियों त्राण
संघर्षों से भाग कर, अगर तजोगे प्राण।
रमेश चारण की पंक्तियां भी बहुत अच्छी थीं-
परेशान ये सोच के ना हो, कि कितनी कम है ज़िन्दगी
सीप के कलेजे पे करीने से, उकेरी शबनम है ज़िन्दगी
खुशबु गोयल ने प्रश्न किया-
क्यों तू निराश है, क्यों तू हताश है
मंजू श्रीवास्तव ने कुछ ऐसे कहा-
मन को कुरेदता यह कैसा सिलसिला है,
ज़िंदगी में आया यह कैसा ज़लज़ला है।
राजीव कपिल ने इन पंक्तियों से आशा का संचार किया-
मैं चल पड़ता हूं गिर कर भी इन पथरीली राहों पर
कदम गर साथ ना दे हौसलों से काम चला लेता हूं।
रश्मि प्रभाकर ने कुछ ऐसे समझाया-
जीवन जीने में कठिनाई आती है ये माना पर,
इन हालातों में मर जाना कोई अच्छी बात नहीं।
रंजना पांडेय की ये पंक्तियां मन को छू गईं-
क्यों ग़म के ज़िक्र में बरबाद कर दूं क़ीमती ये पल,
तलाशूं हल कोई मुश्किल बहुत ये बात है तो क्या
देवप्रिया की इन पंक्तियों में आत्महत्या पर कुछ ऐसे टिप्पणी की-
आत्महत्या तो कोई निदान नहीं,
है ऐसी कौन सी समस्या, जिसका कोई समाधान नहीं।
'साक्षरता' पर मधु खरे की ये पंक्तियां बहुत प्रभावी थीं-
ज्ञान धर्म है, ज्ञान ही विज्ञान है, ज्ञान तो सर्वमान्य है,
ज्ञान से वंचित यदि इंसान है तो उस देश में अंधकार है।
निवेदिता चक्रवर्ती ने स्लम क्षेत्रों की निरक्षरता को इंगित किया-
किताब को रख कर सोता था सिरहाने,
वो आयेंगे मेरी बस्ती में पढ़ाने,
बस विनती है अब जोड़ कर हाथ अपने,
न दे कोई ग़रीब की आंख में सपने।
निवेदिता श्रीवास्तव और इंदु मैत्रा ने अंग्रेज़ी में कविताएं प्रस्तुत कीं।
इसके अलावा 14 सितंबर 2020 को अनुगूँज साहित्यिक संस्था ने अपने मंच के एक मुलाक़ात कार्यक्रम में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी के सहायक प्रोफ़ेसर व विद्वान डॉ. अशोक कुमार ज्योति जी को आमंत्रित किया और व्यावहारिक रूप से देश में हिंदी का स्थान, कामकाज में हिंदी के प्रयोग पर खुल कर चर्चा परिचर्चा की। अशोक जी ने बहुत सारे हिंदी के शब्दों की उत्पत्ति के मूल की जानकारी भी दी।
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5 वर्ष पहले
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