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अमर उजाला शब्द सम्मान 2023 : सुंदर-सी लगती है शब्द और सुरों की यात्रा-  पंडित हरिप्रसाद चौरसिया

हलचल
                
                                                         
                            जो हमारे अंदर शब्द गूंजता है, वह बाहर आकर जब सुर बन जाता है तो मुझे हमेशा यह यात्रा सुंदर-सी लगती है। मैं बार-बार इस यात्रा का आनंद लेता हूं। कहते हैं न कि जिसका सुर से रिश्ता होता है, उसका सारी दुनिया से रिश्ता हो जाता है। सुर से जुड़ने का मतलब है साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला, रंगमंच से जुड़ जाना। मेरे लिए सुर कभी खत्म होने का सफर नहीं है। नए शब्दों में मैं नया सुर ढूंढता हूं। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि सुंदर शब्दों से बने साहित्य और सुरों से सजे संगीत में जब रिश्ता बनता है तो उसका असर देर तक देखने को मिलता है। अमर उजाला का शब्दों और सुर के बीच रिश्ता बनाने के इस प्रयास में मुझे रोशनी की किरण दिखाई दे रही है।
                                                                 
                            

अपनी जिंदगी में शब्दों के सफर पर बात करूं तो पढ़ाई-लिखाई करके नौकरी की थी, स्टेनोग्राफर के रूप में, इलाहाबाद (प्रयागराज) में। उन दिनों प्रेमचंद, प्रसाद सभी को खूब पढ़ते थे। आर्थिक रूप से जितना सक्षम हो सकते थे, पुस्तकें खरीदते थे। नहीं तो पुस्तकालय थे, वहां जाकर पढ़ते थे। साहित्य से हमेशा एक लगाव बना रहा। बाद में जब मैंने और प्रख्यात संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा जी ने शिव-हरि के रूप में फिल्मों में संगीत दिया तो बहुत सारे शायरों, कवियों से संपर्क हुआ। शहरयार, निदा फाजली, जावेद अख्तर जैसे शायर फिल्मों के गीतकार थे। जैसे रत्नों में हीरा होता है, ये शायर भी वैसे ही हैं। लेकिन अब फिल्मों में ऐसी शायरी, ऐसे गीतों का चलन कम होता दिखता है। विदेश की नकल होती है, धुनों पर गीत बैठा दिए जाते हैं। अब हल्के गीत आ रहे हैं। आज लोगों की पढ़ने की प्रवृत्ति कम हो रही है। मुझे अच्छी तरह याद है कि पहले ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ जैसी पत्रिकाएं हर घर में दिख जाती थीं। इलाहाबाद तो साहित्यकारों का गढ़ था। धर्मवीर भारती जी थे, हम लोग तो मित्र थे। जब मन होता, उनके घर चले जाते, मुंबई में भी। उस समय पत्रिकाएं पढ़ी जाती थीं, दाढ़ी बनाते समय हम रेडियो सुना करते थे। आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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