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द बेंगॉलीज़: सिर्फ इतिहास नहीं इतिहास से आगे

The bengalis sirf itihaas nahin itihaas se aage
                
                                                         
                            
नक्सल आंदोलन पर रेड सन और पूर्वोत्तर पर हाइवे 39 जैसी चर्चित किताबें लिखने वाले सुदीप चक्रवर्ती ने बंगाली समुदाय पर एक बेहद ही दिलचस्प किताब लिखी है, जिसमें उनका शोध और श्रम झलकता है। हालांकि, इससे पहले भी सुकुमार सेन की ‘बांगालीर इतिहास’ और नीतीश सेनगुप्त की ‘लैंड ऑफ टू रिवर्स : ए हिस्टरी ऑफ बेंगॉल फ्रॉम महाभारत टू मुजीब’ जैसी बहुचर्चित किताबें आ चुकी हैं। लेकिन सुदीप की किताब बंगाल का इतिहास भर नहीं है। यह उनका उद्देश्य भी नहीं था। इसमें बांग्ला संस्कृति के उद्भव से 21वीं सदी में बंगालियों की स्थिति का विशद चित्रण है।

इस किताब में बांग्ला संस्कृति का गौरव गान कतई नहीं है, बल्कि इसमें लेखक जगह-जगह बंगालियों की कथित श्रेष्ठता ग्रंथि की खबर लेते दिखते हैं। मसलन, वह बताते हैं कि 1920 के दशक में ढाका विश्वविद्यालय कोलकाता विश्वविद्यालय की तुलना में श्रेष्ठ था, लेकिन ढाका को मुस्लिम प्रभाव वाला बताते हुए उसे कोलकाता की तुलना में महत्वहीन करने में बंगालियों की बड़ी भूमिका रही। महाभारत का हवाला देते हुए जब वह कहते हैं, ‘उस युद्ध में बंगाल के राजा कौरवों के पक्ष में लड़े थे।’ मतलब यह कि बंगाली शुरू से ही पराजित समुदाय रहे हैं, तो इसके पीछे उनका व्यंग्य बोध झलकता है।
 

विभाजन और उसके बाद बंगाली समुदाय...

विभाजन और उसके बाद बंगाली समुदाय ने जो जुल्म सहे, लेखक ने उसका बेहद ही मार्मिक ब्यौरा दिया है। खुद उनके दादा ने बांग्लादेश के कुष्ठिया में चर्चित मोहिनी मिल की शुरुआत की थी, लेकिन विभाजन ने उनके परिवार को ध्वस्त कर दिया। वर्ष 1971 में पाकिस्तानियों ने ढाका में रह रहे बंगाली हिंदुओं पर जो जुल्म ढाए, लेखक उसका प्रभावी ढंग से चित्रण सिर्फ इसलिए कर पाया, क्योंकि इसमें उससे व्यक्तिगत अनुभव भी हैं। अलबत्ता किताब का सबसे प्रभावी हिस्सा दंगाग्रस्त नोआखाली में गांधी के पहुंचने का ब्यौरा है। वहां जाकर गांधी ने खुद को बंगाली बताते हुए कहा था कि वह हिंसा को खुद महसूस करने और इसे खत्म कराने के लिए आए हैं। असम से लेकर त्रिपुरा तक में बंगाली समुदाय जिस तरह स्थानीय आबादी के निशाने पर आए, लेखक उसकी गहराई से शिनाख्त करते हुए कहता है कि विस्थापन और हिंसा के बावजूद बंगाली समुदाय ने कभी खुद को शोषित समूह के रूप में पेश नहीं किया। हालांकि, बंगालियों के विगत दौर के बारे में लेखक ने जितनी ऊर्जा खत्म की है, उनके वर्तमान पर उसकी चुप्पी उतनी ही खलती है।

बंगाली समाज वैसे तो पूरे विश्व में मौजूद है, लेकिन उसके दो बड़े केंद्र, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश आज अपने अतीत की छाया भी नहीं रह गए हैं। पश्चिम बंगाल शिक्षा, रोजगार, ज्ञान और आर्थिक प्रगति के मामले में लगातार पिछड़ता गया है, तो बांग्लादेश जिस बांग्ला भाषा और मुजीब की सेक्यूलर सोच पर बना था, वे खंडित हो हैं। लेखक के जो व्यक्तिगत अनुभव इस किताब को महत्वपूर्ण बनाते हैं, वही कई जगह पुस्तक की कमजोरी भी साबित हुए हैं। इसके बावजूद करीब साढ़े चार सौ पृष्ठ में बंगालियों के इतिहास को समग्रता में सामने रखने के लिए लेखक बधाई के पात्र तो हैं ही।

लेखक - सुदीप चक्रवर्ती
प्रकाशन - एलेफ बुक कंपनी
मूल्य - 799 रुपये
8 वर्ष पहले

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