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सुभाष जिनके जीवन से जुड़ी हैं ना जाने कितनी रहस्य की परतें

सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा
                
                                                         
                            
आजादी की लड़ाई के दौरान देश के शीर्ष नेताओं में थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस। 18 अगस्त 1945 को विमान हादसे में उनके निधन की खबर आई। लेकिन इसके बाद लगातार ये खबरें भी आती रहीं कि वो जिंदा हैं। ये दावे 80 के दशक तक होते रहे। ऐसा लगता है कि नेताजी का जीवन ना जाने कितनी ही रहस्य की परतों में लिपटा हुआ है।

अलग-अलग देशों की आला खुफिया एजेंसियों ने अपने तरीकों से इस तारीख से जुड़ी सच्चाई को खंगालने की कोशिश की। कुछ स्वतंत्र जांच भी हुई। कई देशों में हजारों पेजों की गोपनीय फाइलें बनीं। तमाम किताबें लिखीं गईं। रहस्य ऐसा जो सुलझा भी लगता है और अनसुलझा भी।

दरअसल जापान से ये खबर आई कि 18 अगस्त 1945 को दोपहर ढाई बजे ताइवान में एक दुखद हवाई हादसे में नेताजी नहीं रहे। हालांकि हादसे के समय, दिन, हकीकत और दस्तावेजों को लेकर तमाम तर्क-वितर्क, दावे और अविश्वास जारी हैं।

इसी सब पहलुओं को उजागर करती सुभाष बोस पर एक नई किताब आई है। उसका नाम है सुभाष बोस की अज्ञात यात्रा। इसके लेखक हैं संजय श्रीवास्तव। सुभाष के निधन को लेकर पूरा बोस परिवार तक बंटा हुआ है। परिवार के एक हिस्से ने हमेशा माना कि सुभाष जीवित हैं और वो लौटेंगे। उस हिस्से ने रैंकोजी मंदिर में उनकी अस्थियों को भी स्वीकार नहीं किया। इसीलिए वो अस्थियां कभी ससम्मान भारत लाई नहीं गईं। शुरू में उनके बड़े भाई शरत चंद्र बोस को भी लगा कि उनके छोटे भाई की मृत्यु हो चुकी है लेकिन बाद में उन्हें कुछ ऐसी जानकारियां मिलीं कि उन्होंने दावा किया कि उनका भाई जीवित है और जल्द लौटेगा। शरत ने सुभाष के निधन की सच्चाई जानने के लिए जापान, बर्मा (अब म्यांमार) की यात्राएं कीं।
  
उनके इस दावे के बाद देश में लोग मानने लगे जापान ने विमान हादसे की खबर फैलाकर सुभाष को कहीं सुरक्षित जगह पर पहुंचा दिया। देश के आजाद होने के बाद कोई उन्हें स्वदेश लौटने से नहीं रोक सकेगा। आमतौर पर माना जा रहा था कि जापानी विमान ने उन्हें मंचूरिया की सोवियत संघ के लगती सीमा पर उतारा। वहां से वो सुरक्षित उस धरती पर चले गए, जो मित्र सेनाओं की पकड़ से दूर थी। जब आजादी के बाद नेहरू मंत्रिमंडल गठित होना था तो अक्सर ये सवाल नेहरू और सरदार पटेल से प्रेस कांफ्रेंस में पूछा जाता था कि अगर सुभाष लौट आए तो सरकार में उन्हें कौन सी जगह मिलेगी।

देश आजाद हो गया। नेताजी नहीं आए। लेकिन ना जाने कहां-कहां से उनके देखे जाने की खबरें आने लगीं। लोगों को लग रहा था कि सरकार को मालूम है कि सुभाष कहां हैं लेकिन वो इसकी कोई जानकारी नहीं दे रही है। बहुत से लोगों को ये भी लगता था कि सुभाष ने सोवियत संघ से नेहरू को चिट्ठी लिखकर बताया है कि वो किस हाल में हैं और कहां हैं। तरह - तरह की बातें देशभर में नेताजी को लेकर फैलने लगीं थीं। तमाम तरह की प्रतिक्रियाएं होती रहीं।

सरकार को सुभाष के नहीं लौटने का कसूरवार मानने वालों की कमी नहीं थी। ये भी माना गया कि ब्रिटेन सरकार के दबाव में सुभाष को सोवियत संघ से रिहाई में दिक्कत आ रही है। उस समय ना जाने कैसे भारत में ज्यादातर लोग मानने लगे कि हो ना हो नेताजी सोवियत संघ में ही हैं। देश में कोई ये मानने को तैयार ही नहीं था कि नेताजी का निधन हवाई हादसे में हो चुका है।

भारत के अनुरोध पर जापान सरकार ने अपनी शुरुआती जांच रिपोर्ट भारत सरकार को भेजी। उसमें कहा गया था कि तायहोकु में प्लेन क्रैश होने के बाद सुभाष बोस का वहीं के मिलिट्री हास्पिटल में ले जाने पर रात तक उनका निधन हो गया। लेकिन इस प्रकरण की जब जांच की जाने लगी तो उसमें बहुत से छेद नजर आए। किसी भी तरह के दस्तावेज का नहीं मिलना एक बड़ी वजह है जिससे लगता है कि सुभाष का निधन विमान हादसे में नहीं हुआ।
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5 वर्ष पहले

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