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स्त्री मन के अथाह सागर का मंथन करती है वर्तिका नंदा कविता संग्रह  'रानियाँ सब जानती हैं' की कविताएं

पुस्तक समीक्षा
                
                                                         
                            पुस्तक- रानियाँ सब जानती हैं
                                                                 
                            
लेखिका– डॉ.वर्तिका नंदा
प्रकाशक -वाणी प्रकाशन
प्रथम संस्करण -2015
मूल्य - 125 रुपये 


  समीक्षक: सुखनन्दन बिन्द्रा, प्रसारणकर्मी (आकाशवाणी)

डॉ वर्तिका नंदा की लिखी किताब 'रानियाँ सब जानती हैं' उस अंधेरे  की ओर लेज़र लाइट की सी रोशनी छोड़ती है जहां किसी का पहुंचना तो दूर, किसी की सोच तक नहीं जाती। वह कोना है- किसी भी औरत का मन।

किताब के कवर पेज से लेकर आखिरी कविता तक यह किताब स्त्री मन के अथाह सागर का मंथन करती है। हर कविता पढ़ने के बाद आँखें स्वतः ही बंद हो जाती हैं और अंदर ही अंदर हर महिला उस कविता के केंद्र में खुद को पाती है। किसी भी कविता की पात्र कोई विशेष महिला नहीं है बल्कि हर  स्त्री मन का मौन अंतस है। मर्म यह है कि महल में रहने वाली रानी हो, आम जीवन जीने वाली कोई भी महिला या फिर जेल में बंद कोई औरत,  हर स्त्री किसी न किसी अमरबेल की जकड़न में है।

किताब के शुरुआती शब्द औरत के इर्द-गिर्द अभेद चक्रव्यूह की बानगी हैं...

याचक बनाते महिला आयोग,
उखड़ी सांसों की पुलिस की महिला अपराध शाखाओं,
ढुलमुल कचहरियों
और
बार-बार अपराध कर
गोल चबूतरे से थपकियां पाते
तमाम अपराधियों के लिए
जिन्हें जानकर भी चुप रहीं
रानियां


यह कविताएं उंगली नहीं उठाती, कटाक्ष नहीं करती, उपदेश नहीं देतीं, औरत की बेचारगी और मायूसी को  नहीं कहतीं  बल्कि बड़े ही सहज परंतु सटीक तरीके से स्त्री  मन के उद्गार प्रकट करती हैं। इन कविताओं में प्रार्थनाएं हैं, सादर,उत्सव , पानी , बादल,परी,सुर हैं। कुल मिलाकर लेखिका का मकसद है" सिसकियों को लाल धागे में बांधकर  खिलखिलाहट में बदल देना है ताकि दुख की सुरंग सुख के खलिहान में खुले"
(रानियाँ सब जानती हैं पृष्ठ सं-10)

रानियाँ सब जानती हैं स्त्री अंतर्मन का दर्पण है ,इसमें हर महिला को अपना अक्स दिखता है। हर औरत अपने अंदर के पूरे सच को कभी बाहर नहीं ला पाती, मौके पर सच बोल नहीं पाती,और तो और सच सामने हो तो भी कह नहीं पाती । आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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