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'अटक गई नींद': प्रेम की अनोखी व्याख्या

'अटक गई नींद': प्रेम की अनोखी व्याख्या
                
                                                         
                            'चलते रहे रात भर', 'ज़िन्दगी एक कण है' के बाद 'अटक गई नींद' काव्य-संग्रह को पढ़ना और फिर उस पर बिना लिखे रह जाना, संभव नहीं है। संग्रह में कुछ 134 कविताएं हैं जिनमें से लगभग 50 कविताएं छोटी हैं। कुछ कविताएं पिछले संग्रहों से रिपीट हुई हैं। इस संग्रह पर कुछ लिखूं उससे पहले एक कहानी सुनाती हूँ। 
                                                                 
                            

'बात उन दिनों की है जिन दिनों हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर बंगला के अप्रतिम कथाकार शरत चंद्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' लिख रहे थे। उन्हीं दिनों शरतचंद से मिलने के लिए जब वह बंगाल पहुँचे तो पता चला कि, आजकल शरतचंद किसी वेश्यालय में रह रहे हैं। अपने प्रिय रचनाकार की इस घटना ने विष्णु जी को अचंभित किया। वह जानते थे शरत चंद महान और लोकप्रिय साहित्यकार हैं के साथ सम्मानित व्यक्ति भी हैं। खैर, वह जब शरत जी से मिले तो कारण पूछे। 

शरत जी ने बताया- 'आजकल 'चरित्रहीन' लिख रहा हूँ। जो वेश्याओं के जीवन से जुड़ा है। साहित्यकार को कभी भी अपने अनुभव से बाहर लेखन नहीं करना चाहिए।'

 इस घटना का ज़िक्र मैंने अनायास नहीं किया। कोरा मनोरंजन या रोमांचकता साहित्य का उद्देश्य हो ही नहीं सकता। जब तक अनुभव नहीं होगा साहित्य जीवन के आस-पास हो ही नहीं सकता। दावा तो नहीं लेकिन विश्वास से कह सकती हूँ कि राकेश मिश्र की कविताओं में गुथी भावनाएं जीवन के उन व्याकुल पलों का गान हैं जिसकी धुन से हर कोई अपना जीवन राग मिला सकता है। कविता जीवन का यथार्थ केवल व्यक्त ही नहीं करती बल्कि उस यथार्थ को आने वाले समय के गर्भ में डाल कर आने वाले समय से जूझने के लिए खड़ा भी कर सकती है।

'अटक गई नींद' की कविताएं अन्य संग्रहों की भाँति कई विषयों को समेटे हुए हैं लेकिन 'प्रेम' इस संग्रह की मूल भावना है। एक तरह से कहें तो यह संग्रह प्रेम की बहुआयामी व्याख्या है। मैं अपनी बात उनकी प्रेम कविताओं पर ही केंद्रित करती हूँ। राकेश मिश्र के यहाँ प्रेम की कोई शर्त नहीं है। वह घनानन्द की भाँति स्वच्छन्द है, लेकिन उस  छंदता में जो अनुराग का बंधन है वह अनोखा है। 

उसमें जो समर्पण और एकनिष्ठता वह प्रेम का चरमोत्कर्ष है। प्रेम की अक्सर परिणति वियोग ही है लेकिन वियोग ही जब प्रेम का अनंदवास बन जाए तब ये पंक्तियां सृजित होती हैं-

'जीना है
उसके लिए
जिससे जिंदगी अच्छी लगती है
उसके लिए भी
जिस बिन
ज़िन्दगी नहीं है।'


प्रेम की संभावना हर उस जगह होती है, जहाँ समर्पण होता है। प्रेम के उन क्षण को कौन नहीं जीना चाहता है। समय न हो तो प्रेम किया जा सकता है। उसे महसूसा जा सकता है, लेकिन ज़िन्दगी ही न हो तो क्या किया जाए। ऐसी ही पीड़ाओं को आत्मसात कर जीने वाले प्रेमियों के लिए इससे अच्छी कविता क्या हो सकती है-

'बहुत चाहता हूँ
मैं
तुमको 
पर 
देखो-
जब मैं बहुत चाहता हूँ
तुमको
तब ज़िन्दगी
ज़िन्दगी नहीं रहती।'
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7 वर्ष पहले

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