देश की विभिन्न भाषाओं में बनने वाली फिल्मों में सिर्फ भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री ही संभवत: इकलौती इंडस्ट्री के है जिसके तीन कलाकार देश की संसद में हैं। लेकिन, सच ये भी है कि इस फिल्म इंडस्ट्री के आंकड़े जुटाने नाकों चने चबाने से कम नहीं है। भोजपुरी सिनेमा पर निकलने वाली कमोबेश सारी पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। दर्जनों के हिसाब से फिल्में बन रही हैं, लेकिन वह कब, कहां रिलीज हो रही हैं, कितने सिनेमाघरों में रिलीज हो रही हैं और इनका कारोबार कितना हो रहा है, इसका हिसाब किताब कम से कम बीते 15 साल से किसी ने रखने की कोशिश नहीं की है। ऐसे में लेखक डॉ राजेंद्र संजय की किताब 'भोजपुरी फिल्मों का इतिहास' भोजपुरी सिनेमा के प्रशंसकों के लिए किसी उपहार से कम नहीं है।
हाल ही में प्रकाशित किताब 'भोजपुरी फिल्मों का इतिहास' में भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ाइबो' से लेकर भोजपुरी सिनेमा के तीसरे दौर तक की फिल्मों को शामिल किया है। इसमें मनोज तिवारी, रवि किशन, अमिताभ बच्चन और मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मों तक का उल्लेख है। साल 1962 में रिलीज भोजपुरी फिल्म 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ाइबो' भले ही भोजपुरी सिनेमा की पहली फिल्म थी,लेकिन भोजपुरी भाषा का योगदान भारतीय सिनेमा की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' में भी रहा है। इस फिल्म के गीत का एक मुखड़ा 'दरस बिना मोरे हैं तरसे नयना प्यारे मुखड़ा दिखा जा मोहे' पूरे देश में प्रचलित है। किताब के मुताबिक भारतीय सिनेमा की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' के साथ ही भोजपुरी ने अपना स्थान भारतीय सिनेमा में सुरक्षित कर लिया था।
किताब 'भोजपुरी फिल्मों का इतिहास' वैसे तो भोजपुरी सिनेमा के बारे में है। लेकिन भोजपुरी सिनेमा के इतिहास का जिक्र करने से पहले लेखक डॉ राजेंद्र संजय ने सिनेमा का जन्म कब, कहां और कैसे हुआ और भारत में उसका पदार्पण कब हुआ, इसका उल्लेख उन्होंने किया है। इसके अलावा डॉ राजेंद्र संजय ने पाठकों को कई नए विषयों की जानकारी दी है। जैसे कैमरे का इजाद कहां, कैसे हुआ? फिल्मों से उसका नाता कैसे जुड़ा? स्थिर फिल्मों के स्थान पर चलती फिरती फिल्मों की शुरुआत कैसे हुई? देखा जाए तो, सिनेमा का जन्म वास्तव में एक चमत्कार से कम नहीं था। भारत में उन फिल्मों को देखकर प्रथम लघुचित्र किसने बनाई? मूक फिल्मों का दौर कैसे शुरू हुआ? फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता के कारण फिल्मों में व्यापारिकता भी प्रवेश करने लगी थी जिसके कारण सिनेमाटोग्राफ एक्ट यानि सेंसर बोर्ड की स्थापना करनी पड़ी। लेखक ने इन सारी बातों का मोहक अंदाज में मनोरंजक शैली में वर्णन किया है।
साल 1874 में सिनेमा का जन्म कैसे हुआ और साल 1895 तक सिनेमा कहां तक पहुंचा और फिर साल 1898 से लेकर साल 1900 के बाद सिनेमा एक चमत्कार के रूप में कैसे उभरा। मूक सिनेमा का दौर कैसे शुरू हुआ और भारतीय सिनेमा में भोजपुरिया समाज का कितना योगदान रहा। हिंदी के समक्ष बोली जाने वाली अन्य भाषाएं, हिंदी फिल्मों में भोजपुरी गीतों का कैसा सफर रहा। किताब बताती है कि पहले दौर के भोजपुरी सिनेमा का जन्म और विकास साल 1962 से लेकर 1968 तक हुआ। एक पड़ाव के बाद भोजपुरी सिनेमा का दूसरा दौर शुरू हुआ और 1977 से लेकर 1999 तक भोजपुरी सिनेमा में कितने उतार चढ़ाव आए, इसका भी विस्तार से वर्णन ये किताब करती है। और फिर भोजपुरी सिनेमा के तीसरे दौर की शुरुआत साल 2000 में कैसे हुई और यह दौर निरंतर किस तरह आगे बढ़ रहा है,लेखक ने अपने किताब में विस्तृत चर्चा की है।
किताब बताती है कि साल 1931 से लेकर सन 1962 तक के तीन दशकों में मराठी, गुजराती, असमिया, कन्नड़, पंजाबी, उड़िया, मलयालम में फिल्में बनी लेकिन भोजपुरी फिल्म का कहीं नामो-निशान नहीं था। इस बात का अफसोस भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भी था। उनके सुझाव पर बिहार के विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी ने भोजपुरी में फिल्म बनाने का संकल्प लिया। उन्होंने हिंदी फिल्मों के अभिनेता नजीर हुसैन की मदद से भोजपुरी फिल्म 'गंगा मइया तोहे पियरी चढ़ाइबो' बना डाली। भोजपुरी की इस पहली ही फिल्म ने कई नए कीर्तिमान स्थापित कर दिए। इस पुस्तक में सन 1931 से 1961 तक बनी कुल 173 हिंदी फिल्मों में भोजपुरी फिल्मी गीतों की विस्तृत सूची भी दी गई है।
डॉ. राजेंद्र संजय ने किताब 'भोजपुरी फिल्मों का इतिहास' में इस बात का भी खास तौर से उल्लेख किया है कि कैसे तीन- चार फिल्मों के सफल निर्माण के बाद ही दुर्भाग्य ने भोजपुरी फिल्मों के दरवाजे पर दस्तक देना शुरू कर दिया और फिल्में फ्लॉप होने लगी। फिल्म उद्योग में अधकचरे लोगों का प्रवेश होने लगा। अनुभवहीन निर्माता, अधकचरे निर्देशक, तकनीशियन तथा लेखकों ने भोजपुरी फिल्मों का पैसे के खातिर बंटाधार करना शुरू कर दिया। गीतकार राममूर्ति चतुर्वेदी, पद्मा खन्ना, कुमकुम, सुजीत कुमार, चित्रगुप्त जैसे भोजपुरी सिनेमा से जुड़े दिग्गजों ने इसे लेकर भोजपुरी सिनेमा से जुड़े लोगों को सावधान भी किया, लेकिन उनकी बातो का कुछ असर नहीं हुआ और भोजपुरी निर्माण न के बराबर होने लगा। यह स्थिति साल 1968 से 1977 तक बनी रही।
भोजपुरी फिल्मों का दूसरा दौर साल 1977 में रंगीन भोजपुरी फिल्म 'दंगल' से शुरू हुआ और भोजपुरी फिल्मों का दूसरा दौर जगमग उठा। साल 1977 से लेकर 1989 लेकर 'बलम परदेसिया', 'बिदेसिया' , 'धरती मइया', 'गंगा किनारे मोरा गांव', 'पान खाये सईया हमार', 'भैया दूज' जैसी 19 फिल्में बनीं जो आजतक की सफलता का एक रिकॉर्ड है। दूसरे दौर के उत्तरार्ध में 1990 से 1999 तक में 'हमार बेटवा', 'दुलहा', 'हमार सजना', 'घर मंदिर' जैसी 39 फिल्में बनी। सिनेमा के तीसरे दौर की फिल्मों में लेखक ने साल 2000 से 2008 तक की बनी फिल्मों का जिक्र किया है जिनमे रवि किशन की 'सइया हमार', 'पंडित जी बताइ ना बिआह कब होई', मनोज तिवारी की फिल्म 'ससुरा बड़ा पइसावाला', अमिताभ बच्चन की फिल्म 'गंगा' और मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म 'भोले शंकर' का जिक्र किया है। ये ऐसी फिल्में रहीं हैं जिन्होंने भोजपुरी सिनेमा को एक नई ऊंचाई दी। लेखक ने साल 2008 के बाद की फिल्मों और नायकों का जिक्र नहीं किया है। उनकी मानें तो इतिहास बनने में समय लगता है।
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3 वर्ष पहले
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