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Power, Policy, Politics: Inside Modi’s Bharat: सत्ता, नीति और राजनीति के आईने में मोदी के भारत के बारह वर्ष

Power, Policy, Politics: Inside Modi’s Bharat book review in hindi
                
                                                         
                            

पुस्तक: Power, Policy, Politics: Inside Modi’s Bharat 2014–2026
लेखक: विक्रम कपूर
भूमिका: यशवंत देशमुख

पत्रकार विक्रम कपूर की पुस्तक Power, Policy, Politics: Inside Modi’s Bharat 2014–2026 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक दौर के बारह वर्षों में उभरते व्यापक पैटर्न को समझने का प्रयास करती है। पुस्तक का केंद्रीय विचार सरल लेकिन महत्वपूर्ण है—भारत इस अवधि में केवल धीरे-धीरे नहीं बदला, बल्कि कई ऐसे निर्णायक राजनीतिक और नीतिगत क्षण आए, जिन्होंने सरकार, संस्थाओं और नागरिकों के बीच संबंधों को प्रभावित किया।

विक्रम अपनी कहानी की शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक विवाद या नाटकीय फैसले से नहीं, बल्कि अगस्त 2014 में शुरू हुई प्रधानमंत्री जन-धन योजना से करते हैं। लेखक के अनुसार, उस समय यह केवल वित्तीय समावेशन की एक योजना के रूप में दिखाई देती थी, लेकिन बाद के वर्षों में पीछे मुड़कर देखने पर इसका महत्व कहीं बड़ा नजर आता है। बैंकिंग पहुंच, कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी और प्रशासनिक ढांचे का विस्तार आगे चलकर शासन के एक व्यापक मॉडल का हिस्सा बने।

इसके बाद पुस्तक उन महत्वपूर्ण फैसलों और घटनाओं को एक-दूसरे से जोड़ती है, जिन्होंने पिछले बारह वर्षों की भारतीय राजनीति को प्रभावित किया—नोटबंदी, जीएसटी, अनुच्छेद 370 का निरसन, तीन तलाक कानून, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), कोविड-19 लॉकडाउन, कृषि कानून और उनका वापस लिया जाना, महिला आरक्षण विधेयक तथा राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा।
विक्रम इन घटनाओं को केवल अलग-अलग राजनीतिक सुर्खियों के रूप में नहीं देखते। उनका प्रयास इनके पीछे दिखाई देने वाली राजनीतिक कार्यशैली को समझना है।

लेखक के अनुसार इस कार्यशैली के प्रमुख तत्व हैं—केंद्रीकृत निर्णय-प्रक्रिया, फैसलों को तेजी से लागू करने की क्षमता, स्पष्ट राजनीतिक नैरेटिव और कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी। इसके साथ ही कपूर यह भी रेखांकित करते हैं कि आज शासन में धारणा और राजनीतिक संचार केवल नीति के बाद आने वाले तत्व नहीं हैं, बल्कि नीति की राजनीतिक सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
यही वह बिंदु है जहां यह पुस्तक सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम से आगे निकलती है। विक्रम का ध्यान केवल इस सवाल पर नहीं है कि कोई फैसला सही था या गलत। वह यह समझने की कोशिश करते हैं कि अलग-अलग फैसलों को एक साथ देखने पर किस प्रकार की राजनीतिक व्यवस्था और कार्यशैली सामने आती है।

पुस्तक में राजनीतिक विरोध को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है। CAA विरोध, किसान आंदोलन और कोविड-19 संकट को लेखक हाशिये की घटनाओं के रूप में नहीं देखते। उनके लिए ये ऐसे महत्वपूर्ण क्षण हैं, जिन्होंने राजनीतिक संचार, प्रशासनिक नियंत्रण और सरकार के नैरेटिव की सीमाओं को परखा।
कृषि कानूनों का प्रसंग इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन जाता है। सरकार की तेजी से निर्णय लेने की क्षमता के साथ-साथ लंबे समय तक चले किसान आंदोलन और अंततः कानूनों की वापसी यह दिखाती है कि किसी भी राजनीतिक मॉडल की अपनी सीमाएं होती हैं और संगठित एवं निरंतर प्रतिरोध सरकार को पुनर्विचार के लिए मजबूर कर सकता है।

इसी तरह कोविड-19 महामारी ने निर्णायक फैसले लेने की क्षमता के साथ-साथ प्रशासनिक नियंत्रण की सीमाओं को भी सामने रखा। लॉकडाउन का निर्णय तेजी से लिया गया, लेकिन उसके बाद सामने आई मानवीय और आर्थिक चुनौतियों ने यह स्पष्ट किया कि एक जटिल समाज को केवल प्रशासनिक आदेशों से पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
पुस्तक में 2024 का लोकसभा चुनाव भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। कपूर इसे केवल सरकार की जीत या विपक्ष की हार के पारंपरिक चश्मे से नहीं देखते। उनके अनुसार भाजपा राष्ट्रीय राजनीति की केंद्रीय शक्ति बनी रही, लेकिन 2019 की तुलना में कम संसदीय बहुमत ने एक अधिक प्रतिस्पर्धी लोकसभा को जन्म दिया।

एक मतदाता कल्याणकारी योजनाओं का समर्थन करते हुए महंगाई को लेकर चिंता जता सकता है। वह मजबूत नेतृत्व का सम्मान करते हुए जवाबदेही की मांग भी कर सकता है। वह किसी नेता को सत्ता में बनाए रखते हुए उसके बहुमत को सीमित कर सकता है। यही बहुस्तरीय जनादेश भारतीय लोकतंत्र को लगातार दिलचस्प बनाए रखता है।
पुस्तक की एक खास विशेषता इसका जमीनी नजरिया है। भूमिका में चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख भी कपूर की इसी प्रवृत्ति को रेखांकित करते हैं। राजनीतिक समझ केवल संसद, पार्टी कार्यालयों या टेलीविजन स्टूडियो से नहीं आती। वह सड़क, बाजार, गांव, रेलवे स्टेशन और उन लोगों की बातचीत से भी बनती है जो नीतियों की भाषा शायद न जानते हों, लेकिन उनके परिणामों को गहराई से महसूस करते हैं।

कपूर की पुस्तक में मतदाता, किसान, बैंक कर्मचारी, राजनीतिक कार्यकर्ता, पत्रकार और आम नागरिक जैसे कई दृष्टिकोण इसी व्यापक राजनीतिक तस्वीर को बनाने में भूमिका निभाते हैं।

*केवल मोदी या भाजपा की कहानी नहीं*

Power, Policy, Politics की सबसे महत्वाकांक्षी विशेषता यह है कि यह पुस्तक केवल नरेंद्र मोदी या भाजपा की राजनीतिक यात्रा तक सीमित रहने का प्रयास नहीं करती। यह भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप को समझने की कोशिश भी है।
राजनीति पहले की तुलना में अधिक तेज, अधिक दृश्यात्मक और अधिक डेटा-आधारित हुई है। सरकारों का मूल्यांकन अब केवल विचारधारा या पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि योजनाओं की वास्तविक डिलीवरी और उनके प्रभाव से भी होने लगा है। राजनीतिक नैरेटिव लगातार निर्मित और प्रसारित होते हैं और मतदाताओं की अपेक्षाएं भी बदल रही हैं।
साथ ही, पुस्तक यह भी स्वीकार करती है कि राजनीतिक शक्ति के सामने लोकतांत्रिक प्रतिरोध, जनमत और चुनावी सुधार की क्षमता हमेशा मौजूद रहती है।

Power, Policy, Politics: Inside Modi’s Bharat 2014–2026 को न तो मोदी सरकार के पक्ष में लिखी गई प्रशस्ति के रूप में देखना उचित होगा और न ही उसके विरुद्ध आरोप-पत्र के रूप में।
इसकी वास्तविक कोशिश उन राजनीतिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझना है, जो पिछले बारह वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण फैसलों और घटनाओं के पीछे दिखाई देती हैं।
पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि राजनीति में केवल यह मायने नहीं रखता कि फैसला क्या लिया गया। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह फैसला कैसे बताया गया, कितनी तेजी से लागू हुआ, उसका लाभ या नुकसान किस तक पहुंचा और उसके बाद मतदाताओं ने कैसी प्रतिक्रिया दी।
यही दृष्टिकोण इस पुस्तक को समकालीन भारतीय राजनीति को समझने के लिए प्रासंगिक बनाता है।

जो पाठक मोदी सरकार की राजनीति का समर्थन करते हैं, उनके लिए यह पुस्तक उसके राजनीतिक मॉडल को समझने का एक ढांचा प्रस्तुत करती है। आलोचकों के लिए यह सत्ता के केंद्रीकरण, राजनीतिक नैरेटिव और केंद्रीयकृत शासन की सीमाओं पर विचार करने का आधार देती है। वहीं भारतीय राजनीति के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए इसका महत्व इस बात में है कि यह पिछले बारह वर्षों को केवल समर्थन या विरोध के दो खांचों में बांटने से बचने का प्रयास करती है।

अंततः Power, Policy, Politics यह तर्क रखती है कि मोदी युग की कहानी केवल सरकारों द्वारा लिए गए फैसलों की कहानी नहीं है। यह उन फैसलों के संचार, क्रियान्वयन, विरोध, प्रभाव और नागरिकों के अनुभव की भी कहानी है।

29 मिनट पहले

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