समीक्षा शिरीष खरे ने लिखी है-
‘मैं स्वयं को उन लेखकों में रखता हूँ, जिन्हें कृत्रिम बौद्धिकता की तकनीकी बारीकियों का न ज्ञान है, न दावा। मेरी दुनिया अब भी अनुभव, स्मृति, भाषा और मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व से बनती है। ऐसे में ‘कलम, की-बोर्ड और कृत्रिम बौद्धिकता’ जैसी पुस्तक मेरे लिए किसी तकनीकी मार्गदर्शिका से अधिक एक वैचारिक सहयात्री की तरह है।
भवतोष पाण्डेय की यह पुस्तक एआई को न तो भय के रूप में पेश करती है, न चमत्कार की तरह। वह उसे समय के एक अपरिहार्य यथार्थ की तरह रखती है, जिससे बचना संभव नहीं, लेकिन जिससे आँख मिलाकर बात की जा सकती है। इस संग्रह की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह एआई को साहित्य के बाहर खड़ा करके नहीं देखता, बल्कि साहित्य, समाज, भाषा, नैतिकता और लेखकीय जिम्मेदारी के बीच रखकर परखता है।
मेरे जैसे पाठक के लिए यह किताब इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह ‘न जानने’ की स्थिति से संवाद शुरू करती है। यहाँ बिंदुवार विषय-सूची है, स्पष्ट भूमिका है और हर निबंध एक अलग कोण से प्रश्न उठाता है: अनुवाद, आलोचना, पत्रकारिता, लोककथा, स्त्री-दलित-आदिवासी लेखन, यहाँ तक कि लेखक के आलस्य तक पर।
यह पुस्तक केवल लेखकों के लिए नहीं है। यह पाठकों, समीक्षकों, शिक्षकों और उस पूरे समाज के लिए पठनीय है जो अनजाने ही एआई से प्रभावित हो रहा है। भवतोष पाण्डेय का आग्रह स्पष्ट है कि मशीन सोच नहीं सकती, सोचने की जिम्मेदारी अब भी मनुष्य की है।
मेरे लिए यह संग्रह एआई के बारे में जानने से अधिक, अपने समय को समझने की एक ईमानदार कोशिश है और इसी कारण यह किताब आज के साहित्यिक परिदृश्य में एक आवश्यक हस्तक्षेप बनती है।’
शीर्षक - ‘कलम, की-बोर्ड और कृत्रिम बौद्धिकता’
लेखक - भवतोष पाण्डेय
प्रकाशक - बोधरस , लखनऊ
मूल्य - 249 ₹
उपलब्धता - आमेजन, फ्लिपकार्ट आदि
(समीक्षक शिरीष खरे एक वरिष्ठ लेखक, पत्रकार और स्तंभकार हैं। )
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