अपने समय और अपनी दुनिया को समझने के लिए सिनेमा जरूरी है, लेकिन अपने समय, और अपनी दुनिया में चलने के लिए राजनीति की समझ भी जरूरी है। सिनेमा और राजनीति में कई बार सरोकारों, उत्सुकताओं और तनावों की साझेदारी दिखती रही है, और कई बार हम देखते हैं कि कल तक जिस अभिनेता की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा रही थी, आज वह अभिनेता नेता बनकर हाथ जोड़े खड़ा है। एक रिश्ता है, राजनीति और सिनेमा का। आज से नहीं, अमेरिका में रोनाल्ड रीगन को याद कीजिए। उनके अभिनय की भी एक दुनिया थी, उनकी राजनीति के भी दिन थे। दक्षिण भारत में एम.जी. रामाचंद्रन, एन.टी. रामा राव और एम. करुणानिधि जैसे मशहूर अभिनेता और लोकप्रिय नेता की कहानी शोहरत की उस ड्योढ़ी पर शुरू होती है, जहां समर्थकों की भीड़ को राजनीति के सिक्के से तौलने के लिए कोई सपने लेकर आता है, तो कोई राजनीति के सिक्के लेकर।
यह बात दीगर है कि कई बार कोई अभिनेता समाज की परेशानियों को समझते हुए एक निश्चित सोच-विचार के साथ सामाजिक कार्य करने के लिए राजनीति में शामिल होता है और लोगों के बीच काम करता है। इस देश में ऐसे अभिनेताओं के कई उदाहरण हैं। हिंदी फिल्मों का उदाहरण लें तो दिलीप कुमार, देवानंद, सुनील दत्त, शबाना आजमी, राज बब्बर, शत्रुघ्न सिन्हा, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया प्रदा, जया बच्चन, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, गोविंदा, परेश रावल, मिथुन चक्रवर्ती और अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार अलग-अलग कारणों से और अलग-अलग काल में राजनीति में सक्रिय रहे। यहां राजनीतिक सक्रियता का मतलब सिर्फ चुनाव लड़ना भर नहीं है। सामाजिक कार्यों के लिए आगे आना और मंच से लोगों तक अपनी आवाज पहुंचाना भी इसमें शामिल है। इस लिस्ट में और भी नाम हो सकते हैं। फिल्म से राजनीति में गए ऐसे अनेक कलाकार हैं, जिनकी ईमानदारी और निष्ठा पर दूसरे दलों के लोगों का भी भरोसा रहा।
लेकिन एक अभिनेता जिसकी अपनी दुनिया है, प्रशंसकों की कतार है, पैसा है, फिल्में हैं, वह राजनीति में क्यों आना चाहता है? ये सवाल इससे पहले भी कई बार पूछे गए होंगे। इस सवाल को अपनी किताब 'नेता अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पॉवर इन इंडियन पॉलिटिक्स ' में राशीद किदवई ने उठाया है और किताब से गुजरते हुए पाठकों को इसका जवाब महसूस होता है।
आमतौर पर कोई अभिनेता जब किसी राजनीतिक पार्टी में शामिल होता है, तो यही कहा जाता है कि चुनाव प्रचार में भीड़ जुटाने या किसी बड़े नेता के भाषण के पहले श्रोताओं का ध्यान खींचने के लिए राजनीतिक पार्टी ने अभिनेता को अपने साथ जोड़ा है। क्या यह सच है?
'नेता अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पॉवर इन इंडियन पॉलिटिक्स' से गुजरने के बाद आपको लगेगा कि यह एक सच जरूर है, लेकिन सिर्फ यही सच नहीं है। राजनीतिक पार्टियों के लिए भीड़ जुटाने से अलग भी अभिनेताओं की भूमिका रही है। एक ईमानदार भूमिका। वैसे, किसी पार्टी का प्रचार करना भी बहुत जिम्मेदारी भरा काम है। और इस काम में कई अभिनेता खरे उतरे हैं। किताब कई गंभीर सवाल खड़े करती है, तो यहां कई तरह के 'फिल्मी खुलासे' भी हैं। इस किताब में यह भी कहा गया कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अपने बड़े बेटे राजीव गांधी की शादी जानेमाने अभिनेता दिवंगत राज कपूर की बेटी से कराना चाहती थीं। ऐसी कई बातें किताब के बाजार में आते ही सुर्खियां बनी थीं।
और भी कई छोटे-बड़े रोचक प्रसंग हैं। जिससे किताब की सरसता बनी रहती है। कई बार सरसता का मोह लेखन को कमजोर भी कर सकता है, लेकिन पत्रकार लेखक किदवई इस मोह के बावजूद खुद को बचा ले गए हैं। कई बार किसी व्यक्तित्व के साथ ऐसा भी हुआ है कि नेता और अभिनेता साथ-साथ सांस लेते हुए दिख रहे हों, लेकिन यह किताब बारीकी से इस बात की पड़ताल करती है कि वे अलग हैं तो कैसे हैं। रजत पर्दे का अपना ही एक लोक है, वहां बॉक्स ऑफिस की सफलता पर तालियों की गूंज बार-बार सुनाई देती है, लेकिन अभिनेता से नेता बन जाने के बाद मन में छटपटाती आशंकाएं, अपने को लेकर अपनों से ही टकराहटें, शिकायतें और उलाहने के दौर के बीच की भी एक दुनिया होती है, जहां कई बार कोई साथ नहीं होता। इस सच को भी आप यहां महसूस कर पाएंगे।
किताब- नेता अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पॉवर
लेखक - रशीद किदवई
प्रकाशन - हैचेट इंडिया
मूल्य -599 रुपये
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