अध्ययन कक्ष: कंटेंट के जंगल में खोता बचपन
लाइक, फॉलो, सब्सक्राइबः इन्फ्लुएंसर किड्स एंड द कॉस्ट ऑफ ए चाइल्डहुड ऑनलाइन
लेखिका : फोर्टेसा लतीफी
प्रकाशक : साइमन एंड शूस्टर
हाल ही में प्रकाशित यह बेस्टसेलर चाइल्ड इन्फ्लुएंसर इंडस्ट्री और बचपन में इंटरनेट पर मशहूर होने के खतरों की तीखी पड़ताल है। यह ऐसे लोगों के लिए खास है, जो इंटरनेट पर बचपन को बेचने की कीमत और उसके नैतिक पहलुओं को समझना चाहते हैं।
जब जूली जेप्सन ने यूट्यूब पर अपने बच्चों की जिंदगी के बारे में बताना शुरू किया, तो उन्हें एक अजीब बात पता चली कि ‘दर्द बिकता है।’ आठ बच्चों की यह गृहिणी मां, जिसने 2016 में कुछ अतिरिक्त कमाई के लिए व्लॉगिंग करना शुरू किया था, 2022 में अपने पति से अलग होने के बाद इसे एक पूर्णकालिक व्यवसाय बना लिया। अब उनके दो लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं।
जेप्सन कहती हैं, ‘सबसे लोकप्रिय वीडियो वे थे, जिनमें नाक से खून बह रहा था, हाथ टूटा हुआ था, या इमरजेंसी रूम में जाना पड़ा था। लोग जानना चाहते हैं कि क्या हो रहा है? इसलिए वे ऐसे वीडियो देखते हैं।’
पत्रकार फोर्टेसा लतीफी ऐसे बच्चों की जिंदगी की गहराई में उतरती हैं, जिनके माता-पिता उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों से पैसे कमाने लायक कंटेंट निकालते हैं। ऐसा करके वह निजता के उल्लंघन, आर्थिक शोषण और बाल श्रम सुरक्षा की कमी जैसी समस्याओं को उजागर करती हैं। वह उन दबावों, मानसिक आघातों और परिणामों का पर्दाफाश करती हैं, जिनका सामना उन बच्चों को करना पड़ता है, जिन्हें जबर्दस्ती सुर्खियों में धकेल दिया जाता है। चाइल्ड इन्फ्लुएंसर इंडस्ट्री और बचपन में इंटरनेट पर मशहूर होने के खतरों पर आधारित एक तीखी पड़ताल लाइक, फॉलो, सब्सक्राइब उनके लिए खास है, जो इंटरनेट पर मशहूर होने की कीमत और ऑनलाइन कंटेंट से जुड़े नैतिक पहलुओं को समझना चाहते हैं। चौबीसों घंटे कैमरे के सामने रहते हुए बड़ा होना कैसा लगता है? अपने बचपन के पलों को लाखों लोगों को कंटेंट के तौर पर बेचे जाते देखना कैसा होता है? क्या होता है, जब कोई अपना बचपन बेच देता है और बड़ा होने पर उसके पास कोई आर्थिक सुरक्षा कवच भी नहीं होता? कैसा लगता है, जब आपके निजी पल लाखों लोगों के सामने परोस दिए जाते हैं?
लतीफी लिखती हैं कि ये बच्चे चाइल्ड इन्फ्लुएंसर इंडस्ट्री के घने जंगलों में खो गए हैं। यह किताब उन माता-पिता को समझने की कोशिश करती है, जो अरबों डॉलर की इन्फ्लुएंसर इंडस्ट्री में दौलत, अटेंशन, ताकत और रुतबा पाना चाहते हंै। साथ ही, यह भी बताती है कि इसका बच्चों पर क्या असर पड़ता है और आखिर लोग उनके वीडियो देखना बंद क्यों नहीं कर पाते। लतीफी बड़ी कुशलता से पाठकों को इन्फ्लुएंसरों की अलग-अलग श्रेणियों से परिचित करवाती हैं।
लतीफी इन चमकीली प्रस्तुतियों के पीछे का सच सामने लाती हैं। वह एक ऐसे पिता के बारे में बताती हैं, जिन्होंने अपने प्रोडक्ट प्रमोशन वीडियो में हिस्सा लेने के लिए हर बच्चे को 1,000 डॉलर की ‘रिश्वत’ दी थी। लतीफी एक हमदर्द कहानीकार भी हैं। वह इस पर भी जोर देती हैं कि कैसे पैसे का लालच कुछ ऐसे परिवारों को आगे बढ़ाता है, जो आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे होते हैं। वह उन माता-पिता के बारे में भी बताती हैं, जिन्हें अपने बच्चों के बारे में निजी बातें पोस्ट करने का पछतावा होता है।
यह सामयिक और आंखें खोलने वाली किताब न केवल जहरीली सोशल मीडिया संस्कृति के नुकसान को उजागर करती है, बल्कि इन्फ्लुएंसर परिवारों को बेहतर ढंग से विनियमित करने, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और शोषण के इन कुचक्रों को बनाए रखने में दर्शकों की भूमिका पर सवाल उठाने के लिए भी रूपरेखा प्रदान करती है।
कमेंट
कमेंट X