कर्म और उसके प्रतिफल, दर्शन की समस्याओं और आध्यात्मिक प्रश्नों के मुख्य अंग हैं। भारतीय चिंतन परंपरा मानती है कि हमारे कर्म ही यह परिभाषित करते हैं कि वर्तमान जन्म में हमारा जीवन कैसा होगा और हमारे भावी जीवन की नियति क्या होगी? शरीर, मन, इंद्रियों और बुद्धि द्वारा किए गए सभी कार्य कर्म कहलाते हैं। हम हर पल कोई न कोई कर्म करते ही रहते हैं। यहां तक कि कर्म करने से बचना भी एक तरह का कर्म है। किताब 'कर्म सूत्र' में कर्मफल के मूल सिद्धांतों पर विचार किया गया है। दिलचस्प बात यह है कि इस पुस्तक के लेखक हिंगोरी ने अपने जीवन का आधा हिस्सा एक नास्तिक के रूप में बिताया है। उनके आस्तिक होने की कहानी भी बड़ी रुचिकर है।
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