चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता सन्तति और उसके रचयिता देवकीनन्दन खत्री को जानना-समझना हो तो इससे बेहतर कोई किताब नहीं हो सकती। यह उनके लिए काफी हद तक उपयोगी है, जो सब-कुछ या बहुत-कुछ जानना चाहते हैं। ‘चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म’ में लेखक ने मानो देवकीनन्दन खत्री के रचनाकाल को जीवंत कर दिया है। किताब उस दौर की कई और अनूठी जानकारियां देती है। व्यापक लोकप्रियता के बावजूद चन्द्रकान्ता, चन्द्रकान्ता सन्तति और बाबू देवकीनन्दन खत्री पर चर्चा कम ही हो पाई है।
आलोचक वागीश शुक्ल की यह किताब इसी कमी की भरपाई करती है। लेखक ने बेहद सूक्ष्मता से इन दोनों कृतियों का आकलन किया है। कई शोधपरक जानकारियों, उद्धरणों और प्रसंगों के हवाले से देवकीनन्दन खत्री की विशिष्टताएं बताई हैं। उनकी आलोचनाओं का जवाब भी दिया है। दोनों कृतियों के आकलन के क्रम में साफ होता है कि बाबू देवकीनन्दन खत्री जिस सम्मान के हकदार थे, वह नहीं मिला। उस दौर के उद्धरणों और अन्य युक्तियों से लेखक ने चन्द्रकान्ता पर अश्लीलता के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है।
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