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Book Review: जन और जनतंत्र के सबद को समेटने की सुन्दर कोशिश करते 'तुमड़ी के शब्द'

किताब समीक्षा
                
                                                         
                             एफ्रो - एशियाई शांति सम्मलेन में एक बार जैनेन्द्र और हरिशंकर परसाई की मुलाकत के दौरान जैनेन्द्र ने परसाई पर कटाक्ष किया ,' बड़ी दूर से आये हो इस सम्मलेन में भाग लेने के लिए ,रूस से बहुत पैसा मिला होगा। परसाई ने जवाब दिया ,' हाँ जितना पैसा आपको इस सम्मलेन को असफल कराने के लिए सी आई ए से मिला है ,उससे कहीं ज़्यादा मुझे रूसी पैसा मिला है।  
                                                                 
                            

लेखकों को गुटों में बाँटने और उसी अलोक में उनकी रचनाओं को देखने की परम्परा नई नही हैं।  बस आज लेखों पर 'सरकारी'  और 'सरकार विरोधी' का लेबल है। बिना रचनाओं को पढ़े और समझे रचनाओं के पक्ष और विपक्ष में जुलूस निकाल देने की प्रथा पहले की अपेक्षा अब ज़्यादा बढ़ गयी है। 

इस अविवेकी आंदोलन का हालिया शिकार रचना है - 'तुमड़ी के शब्द' जो बद्री नारायण द्वारा लिखी गयी है और वर्ष 2022 के साहित्य अकादमी पुरस्कार (हिंदी भाषा )से सम्मानित है। चूँकि मीडिया और सोशल मीडिया में लेखक पर सरकारी सरंक्षण का आरोप लगा तो मैं यहाँ बताना चाहूंगा कि 56 कविताओं के इस संग्रह में एक भी ऐसी कविता नहीं है जिसमें सरकार की स्तुति हो। यहाँ यह भी बताना समीचीन होगा कि मैंने श्री बद्रीनारायण की पूर्व में कोई रचना नहीं पढ़ी है। 
 

अब बात तुमड़ी के शब्द की

छायावाद के प्रमुख स्तम्भ निराला ने छन्दों से कविता की मुक्ति की बात की थी। स्वयं निराला के शब्दों में ,'मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति कर्म के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छन्दों के शासन से अलग हो जाना है।' इस संग्रह में कवितायें छंदों से मुक्त हैं और यह संग्रह प्रबंध न होकर मुक्तक है। सारी कविताओं को पढ़ें और आप उनसे अपेक्षा करें कि कोई एक स्पष्ट धारा फूटे , यह कोई जरूरी नहीं।  नामवर सिंह का मानना है कि अगर आप ऐसा सोचते हैं तो यह कविता पर एक 'लोड' डालने जैसा होगा। इस संग्रह की प्रत्येक कविता दूसरे से स्वतंत्र है -विषय में भी ,कथ्य में भी।  विचारों में उभयनिष्ठता अवश्य मिलती है।  

इस संग्रह की प्रतिनिधि कविता  'तुमड़ी के शब्द' में रहस्यवादी भाव मिलते हैं।  कवि इन शब्दों को किसी परिमिति में नहीं रखना चाहता है।  

यह सबद की तुमड़ी है 
कि तुमड़ी का शब्द 
कहना कठिन है 

यह शब्द कितना शाश्वत है 
कितना क्षणभंगुर 
कहना कठिन है 

यह कितना नानक का है 
कितना कबीर का 
कि कितना बोधा ,रैदास का 
हिगराना कठिन है 
बिलगाना कठिन है 
कि यह कितना जौनपुर से आये खिलाड़ी राम का 

इस शब्द में क्या है 
बुझना कठिन है।   '

पर इन तुमड़ी के शब्दों उद्देश्य स्पष्ट है। 

' पर सुनों ! इस शब्द से निर्बल को बल मिलता है 
निर्धन को धन 
अंधे को आंख मिलती है 
और बहरे को कान    --

इससे अपमानितों को सम्मान मिलता है 
मिलता है इसमें निचलों को उठान 
इन्हीं शब्दों से गरीबी में जनमता है 
ताज और तख़्त हिलाने का स्वप्न '
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अब बात तुमड़ी के शब्द की

3 वर्ष पहले

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