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Book Review: जन और जनतंत्र के सबद को समेटने की सुन्दर कोशिश करते 'तुमड़ी के शब्द'

किताब समीक्षा
                
                                                         
                             एफ्रो - एशियाई शांति सम्मलेन में एक बार जैनेन्द्र और हरिशंकर परसाई की मुलाकत के दौरान जैनेन्द्र ने परसाई पर कटाक्ष किया ,' बड़ी दूर से आये हो इस सम्मलेन में भाग लेने के लिए ,रूस से बहुत पैसा मिला होगा। परसाई ने जवाब दिया ,' हाँ जितना पैसा आपको इस सम्मलेन को असफल कराने के लिए सी आई ए से मिला है ,उससे कहीं ज़्यादा मुझे रूसी पैसा मिला है।  
                                                                 
                            

लेखकों को गुटों में बाँटने और उसी अलोक में उनकी रचनाओं को देखने की परम्परा नई नही हैं।  बस आज लेखों पर 'सरकारी'  और 'सरकार विरोधी' का लेबल है। बिना रचनाओं को पढ़े और समझे रचनाओं के पक्ष और विपक्ष में जुलूस निकाल देने की प्रथा पहले की अपेक्षा अब ज़्यादा बढ़ गयी है। 

इस अविवेकी आंदोलन का हालिया शिकार रचना है - 'तुमड़ी के शब्द' जो बद्री नारायण द्वारा लिखी गयी है और वर्ष 2022 के साहित्य अकादमी पुरस्कार (हिंदी भाषा )से सम्मानित है। चूँकि मीडिया और सोशल मीडिया में लेखक पर सरकारी सरंक्षण का आरोप लगा तो मैं यहाँ बताना चाहूंगा कि 56 कविताओं के इस संग्रह में एक भी ऐसी कविता नहीं है जिसमें सरकार की स्तुति हो। यहाँ यह भी बताना समीचीन होगा कि मैंने श्री बद्रीनारायण की पूर्व में कोई रचना नहीं पढ़ी है। 
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अब बात तुमड़ी के शब्द की

3 वर्ष पहले

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