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नयी भाषा की परिभाषा बनती हुई कविताएँ: सपना भट्ट का कविता संग्रह- 'भाषा में नहीं'

पुस्तक समीक्षा
                
                                                         
                            समकालीन कविता के चमत्कारिक शब्दों और सिंथेटिक बिंबों के इस दौर में संजीदा और आत्मीय गंधों वाली कविताओं को ढूंढना बहुत आसान नहीं है। हज़ारों-हज़ार कवितायें रोज़ लिखीं जा रही हैं। इस क्रम में उनके कथ्य आपस में गडमड हो रहै हैं। कविताएं नित अपना रूप-रंग-भाषा-गन्ध बदल रही हैं। वे कविताओं की बजाए सूक्तियां बनती जा रही हैं।  कवि अपनी पहचान को लेकर उद्विग्न व बेचैन हैं। दिक्क़त तो ऐसी भी है कि कवि से निकलकर पाठकों तक कवितायें नहीं पहुँच पा रहीं। कवि परेशान है और पाठक हलकान है! ऐसे में, इन दिनों जिन कवियों ने अपने अलग कहन और गहन भाषा को लेकर कविता प्रेमियों का ध्यान आकृष्ट किया है उनमें सपना भट्ट का नाम प्रमुख है। सपना जी की कविताओं में अनछुए दृश्य, टटके बिम्ब और कहन की ताज़गी है। कविताओं में लोकधुन-सा एक ताल और संगीत है। उनकी कविताओं में एक मद्धम धुन सी बजती है, कुछ अव्यक्त-सा हमेशा ध्वनित होता है। कविताओं में राग, रंग, पीड़ा, प्रेम, दुःख, संघर्ष हर भावनाएं अपने अलग और अनोखे अंदाज़ में बयान होते हैं।  इसलिए आज वे समकालीन कवियों के महत्वपूर्ण नामों में एक हैं। 
                                                                 
                            

अभी हाल में ही सपना भट्ट का दूसरा काव्य संग्रह “भाषा में नहीं“ सेतु प्रकाशन से शाया हुआ है, उसका स्वागत है। सपना भट्ट आश्वस्ति और उम्मीद की कवि हैं। वे कहती हैं – 

सूर्य को पुकारते रहने से भी
जब अन्धेरा नहीं छंटता है
आत्मा के आँगन में खुलती
 एक अकेली आदिम खिड़की को पुकारता हूँ “ (भाषा में नहीं)। 


इन पंक्तियों में एक आर्द्र किन्तु आशा से भरी कारुणिक आवाज़ सुनी जा सकती है। एक शाश्वत सवाल हरेक कवि का पीछा करता है कि हम लिखते क्यों हैं - और वह भी कविता। इस सवाल का एक माकूल जवाब इन कविताओं में मिलता है। वे लिखती हैं ,” ईंधन के बाद बची राख से भी / मले और घिसे जा सकते हैं बासन “ ये दो पंक्तियाँ ही काफ़ी हैं।  उनके लेखन का निहितार्थ भी यही है!  

आलोचक प्रभात मिलिंद कहते हैं, “हम बेशक उनको समकालीन हिंदी कविता की एलिजाबेथ बैरेट नहीं माने, तो भी यह कहना ग़लत नहीं होगा कि हिंदी कविता के आगामी इतिहास में जब कुछ सुन्दर और मार्मिक प्रेम कविताओं का ज़िक्र होगा तो उनमें कुछ उनकी भी कवितायें दर्ज होंगी।” सपना भट्ट निष्कलुष प्रेम व आत्मीय रिश्तों की सशक्त कवि हैं। सपना जी की प्रेम कवितायें देह से इतर आत्मिक व निर्विकार प्रेम की कथा है जिसमें कामनाओं की गंध नहीं अपितु त्याग और दुनिया को सुंदर रूपाकार देने की प्रार्थना भी है। प्रेम को परिभाषित करने का उनका अपना तरीका है। 

पंक्तियाँ देखें – 
जबकि दुनिया में सुलग रही है
अन्याय की राजनीतिक सामजिक आग
तिस पर जब एक भीषण महामारी का
प्रकोप सह रही है यह दुनिया
मैं प्रेम कवितायें लिखती हूँ... 
कितनी निर्लज्ज हूँ
 मेरे अस्तित्व से समाज को क्या लाभ ! 


 और जब निर्विकार निष्कलुष प्रेम की बात आती हैं , तो वे बड़ी ख़ूबसूरती से कहती हैं – 

प्यार मेरे 
ऐसी कौन सी दिशा है जो तुम तक नहीं जाती ? 
मेरा मुख आज
तुम्हारे चमकीले सूर्य की उजास से प्रकाशित है
 मैं अनगिनत दिशाओं से तुम्हारी ओर आ रही हूँ।


यह प्रेम में आत्मोसर्ग की कमाल की पंक्तियाँ हैं। दरअसल प्रेम परिभाषा विहीन हैं , किन्तु ऐसी ख़ूबसूरत पंक्तियाँ प्रेम को शब्दों में व्यक्त करती हैं।
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2 वर्ष पहले

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