कला, संगीत और रंगमंच पर आधारित यह एक नई पत्रिका की दस्तक है, जिसका प्रवेशांक मुख्यतः उत्तर प्रदेश के रंग परिदृश्य पर केंद्रित है। लखनऊ, वाराणसी और इलाहाबाद जैसे शहरों के रंगमंच का तो अक्सर जिक्र होता रहता है, लेकिन इसमें बरेली, शाहजहांपुर, मथुरा और आजमगढ़ के रंगकर्म पर भी विस्तार से चर्चा है।
पत्रिका बताती है कि किस प्रकार छोटे शहरों में भी रंगमंच को लेकर सक्रियता बनी हुई है। औरंगजेब के संगीत विरोध पर विजयशंकर मिश्र, सैयद हैदर रजा पर रेखा के. राणा का आलेख पत्रिका को महत्वपूर्ण बनाता है।
कला-संगीत पर ज्यादातर पत्रिकाएं या तो सरकारी संस्थानों की हैं या वे चिकने कागजों पर अपने चटकीले, रंगीन स्वरूप में चाक्षुष प्रभाव को प्रमुखता देती हैं। ऐसे में यह पत्रिका बड़ी सादगी के साथ अपने श्वेत-श्याम पृष्ठों पर चिंतनपरक, गंभीर और विश्लेषणात्मक सामग्री प्रस्तुत करती है।
किताब- नादरंग
संपादक- आलोक पराड़कर
प्रकाशक- नादरंग प्रकाशन, लखनऊ
मूल्य- 100 रुपये
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