गिरीश कार्नाड के नाटकों से हिंदी के पाठक परिचित रहे हैं। 'तुगलक', 'रक्त कल्याण' या 'अग्नि और बरखा' इनके ऐसे नाटक हैं, जो खूब पढ़े गए, मंचित हुए और सराहे गए। इनके नाटकों में समाज े का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है।
इस समाज की अपनी एक कहानी होती है, जिसे हम जानते हैं, अनुभव करते हैं, लेकिन कभी उसके बारे में गहराई से नहीं सोचते कि ऐसा क्यों है? गिरीश कार्नाड अपने नाटकों के माध्यम से सामाजिक रूढ़ियों को बड़ी बारीकी से उठाते हैं और अंत में हमारे सामने एक सवालिया निशान छोड़ जाते हैं। 'बिखरे बिम्ब और पुष्प' में गिरीश कार्नाड द्वारा कन्नड़ भाषा में लिखे गए दो नाटकों ‘बिखरे बिम्ब’ और ‘पुष्प’का हिंदी अनुवाद संकलित है। मॉनोलॉग की शैली में लिखे गए ये नाटक हमसे कुछ नैतिक सवाल पूछते हैं।
लेखकः गिरीश कारनाड
अनुवादः पद्मावती राव
प्रकाशनः राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य ः200 रुपये
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