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गई दुनिया, नई दुनिया: कोरोना संकट में ढाढस बंधाती अशोक चक्रधर की आपदा प्रबंधन की कविताएं

गई दुनिया, नई दुनिया: कोरोना संकट में ढाढस बंधाती अशोक चक्रधर की आपदा प्रबंधन की कविताएं
                
                                                         
                            दुनिया रोज ब रोज बदल रही है और इधर तो कुछ ज्यादा ही। इस बदलती दुनिया के बारे में कल लोग लिखेंगे कि कैसा दौर था आज का कि हम एक दूसरे से दो गज की दूरी बना कर रखते थे। कोराना ने सारी दुनिया को तबाह कर रखा था। सारे कामकाज ठप कर अपने अपने घरों में कैद रह कर भी हम इस अदृश्य दुश्मन से पार नहीं पा सके। पूरी दुनिया एक अदने से वायरस के आगे ठप पड़ गयी थी।
                                                                 
                            

सारे हथियार, अस्त्र-शस्त्र और बड़े देशों की बंदरघुड़कियों की एक न चली इस निरंकुश वायरस पर। इस दौर को देखें तो बचपन का अनुभव याद आता है। अंधेरे में राह चलते कोई पत्ता भी खड़कता तो हम हनुमान चालीसा पढ़ने लगते थे। जैसे हनुमान जी संकट से बचा लेंगे। आज कोरोना को आए 6-7 महीने होने को आए। लोग घरों में कैद हैं, बच्चे आन लाइन पढ़ रहे हैं। कवियों के कारोबार बंद हैं। न कवि सम्मेलन, न सेमिनार, न लिफाफे।

न स्कूल न काॅलेज, यह भी दिन देखना था। पर आज देखें तो फेसबुक, यूट्यूब और सोशल मीडिया पर लेखकों कवियों की दहाड़ सुनाई दे रही है। वे कोरोना से आर पार लड़ाई के मूड में आ गए हैं। ऑनलाइन आने की सुविधा ने सबको कवि बना दिया है, सबको विमर्शकार। सारी दुनिया इंटरनेट की मुट्ठी में है और दुनिया कोरोना की मुट्ठी में। क्या अजब आलम और दृश्य है। ऐसे में हमारे समय के हास्य और व्यंग्य के शिरोमणि कवि अशोक चक्रधर जी किस मुद्रा में हैं यह देखना समीचीन होगा। पर यहां तो सदैव की तरह अशोक चक्रधर ठहाका लगाते हए नजर आ रहे हैं और यह दुहराते हुए कि- 
 
हार में ना जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं।

पर मुझे पता है कवि अपने भय का पता नहीं लगने देते। लाख जगूड़ी कहें, भय भी शक्ति देता है पर भय से इन दिनों लेखकों कवियों की बोलती बंद है। कविता तो कैसी निकलेगी मुंह से इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। पर फिर भी ऐसे भयावह वातावरण में भी हास्य एवं व्यंग्य के पुरोधा कवि अशोक चक्रधर अपना काव्य ' गई दुनिया नई दुनिया' लेकर आए हैं जिससे गुजरते हुए सकारात्मक विद्युत शक्ति जैसी महसूस होती है। अशोक जी विवेकी व्यक्ति हैं। धीरज न खोने वाले। कवि हैं तो आर पार देखने की क्षमता भी रखते हैं। वे मरते हुए व्यक्ति  को भी हास्य की कविता सुना दें तो किसी अंग- उपांग में प्राण बचे हों तो लौट आएं। 

माना कि संसार मर रहा है, परेशान हैं पर परेशानहाल दुनिया को और परेशान करना या उसके सामने मर्सिया पढ़ना अशोक जी की फितरत में कभी नहीं रहा। वे जीवन के कवि हैं, हास परिहास के कवि हैं, वे विट के कवि हैं, ह्यूमर के कवि हैं, वे प्रेरणा के कवि हैं, उदभावना और संभावना के कवि हैं, जीवन के कवि हैं। तभी तो वे कह रहे हैं कि गयी दुनिया अब नई दुनिया है मास्क वाली, दो गज दूरी वाली, व्यर्थ बाजार कस्बे में न टहलने वाली, कवियों के लिए भी ये अज्ञातवास के दिन हैं तो भइया वहीं रहो कृपा करके। तालियां इंटरनेट पर भी खूब मिलेंगी। अब यह नई दुनिया है। 
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6 वर्ष पहले

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