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कर्तव्यों की अपेक्षाएँ और देह का डर स्त्री की नींद में सबसे बड़े घुसपैठिए हैं

कर्तव्यों की अपेक्षाएँ और देह का डर स्त्री की नींद में सबसे बड़े घुसपैठिए हैं
                
                                                         
                            'आँखें सूजी
                                                                 
                            
चेहरा पानी था
वज़ूद था कि एक ज़र्बज़दा बूँद
मैंने रोने की तमाम वज़हें दी थीं
तमाम वज़हें दी थीं बिखर जाने की
पर वह थी कि अब भी
जब्तशुदा
बहुत लाचार
बहुत नाकाम
बदन काँपता ही रहा
सदियों से बेहिस आँधियों के थपेड़ों में
माथे पर फेरा दो चार बेबस हाथ
होंठ खोले और बंद किए
और मैं बस इतना ही कह पाया
"इससे अच्छा तो रो लो एक बार." (संग्रह की कविता 'बेहतर है रो लो अब')

 
अनुराधा सिंह मेरी प्रिय समकालीन कवियों में एक हैं। एक पाठक के तौर पर मैं विगत कई वर्षों से उनकी कविताएँ पढ़ता रहा हूँ। अपनी प्रखर काव्य-दृष्टि और सजग अभिव्यक्ति की पैनी क्षमता के कारण वह वर्तमान कविता-परिदृश्य में एक ताज़ा, ज़िद्दी, जुझारू और अविजित स्वर के तौर पर एक नई तीव्रता के साथ उभरी हैं। मेरी दृष्टि में अपने एकदम भिन्न और साफ़गो तेवर की वज़ह से वह अपने समय और समाज की प्रमुख प्रतिनिधि स्त्री कवयित्री हैं, और अनेक अर्थों में निर्विकल्प भी हैं।

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा सद्य प्रकाशित उनका पहला कविता-संग्रह 'ईश्वर नहीं नींद चाहिए' मेरी इस पाठकीय अवधारणा की पुष्टि करता है। इस संग्रह की कविताएँ अपनी भाषिक स्थापनाओं, अंतर्वस्तु की धारदार नव्यता और तरल आनुभूतिक प्रस्तुतियों के कारण अरसे तक हमारी संवेदनाओं को अपनी ज़द में लिए रखती हैं। निश्चित रूप से अपनी पोएटिक इंटेंसिटी की वज़ह से ये विरल कविताएँ हैं।

विगत वर्षों में स्त्री-विमर्श के नाम पर हिंदी गद्य और पद्य दोनों में जो कुछ भी लिखा-रचा गया, वह कालांतर में विविध कारणों से किसी न किसी रूप में वैचारिक विचलन का शिकार हो गया। बहुत कम शेष रह पाया जो हमारी स्मृति का एक स्थायी हिस्सा बन पाने में सफल हो सका। अनुराधा सिंह उन गिने-चुने नामों में हैं जिन्होंने इस प्रतिगामी जड़ता को तोड़ने की दिशा में सार्थक और साहसिक पहल की है। 

'जिन्होंने प्रेम और स्त्री पर बहुत लिखा
दरअसल उन्होंने ही किसी स्त्री से प्रेम नहीं किया' (पृष्ठ - 12 ; कविता - लिखने से क्या होता है) 

ये पंक्तियाँ कवि के वैचारिक चयन को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं। वह आगे कहती हैं- 

'अब तय करना
किस भाषा में मिलोगे मुझसे
क्योंकि मैं तो व्याकरण से उलट
परिभाषाएं तोड़ कर मिलूँगी (पृष्ठ - 26 ; कविता - स्वागत है नए साल!)।


इन पँक्तियों में कवि का कातर आर्तनाद नहीं सुनाई देता बल्कि मनुष्य के रूप में एक ऐसी चौकस स्त्री के प्रतिरोध की अनुगूँज सुनाई पड़ती है जो अप्रत्यक्ष के पार देखने-सुनने को उद्यत है।

अनुराधा सिंह की कविताओं का अपना एक अलग और विशिष्ट पाठक वर्ग है। हिंदी कविता के लिए यह एक महत्वपूर्ण बात है क्योंकि यहाँ एक स्त्री कवि की कविताओं को विमर्श-विशेष के तयशुदा जॉनर में धकेल देने की एक समृध्द कुंठित परंपरा रही है। अनुराधा सिंह का कवि अपने भीतर के मनुष्य और स्त्री के साथ-साथ गलबहियाँ डाले चलता है। यह श्रमसाध्य संतुलन उनकी कविताओं में स्पष्ट अनुभूत किया जा सकता है। कहीं किसी तरह की कोई प्रतिस्पर्द्धा नहीं, और न एक-दूसरे को अतिक्रमित करने की कोई आतुर-दुराग्रही प्रबलता ही। कविता-संग्रह का शीर्षक 'ईश्वर नहीं नींद चाहिए' प्रतीक रूप में कवि की पक्षधरता को भी रेखांकित करती है। 

'जिस दिन तिनके बीनना बंद कर दूँ
क्या तब भी माना जाएगा
उर्वर हूँ
बना रही हूँ घोंसला
आने वाली सन्तति के लिए
छुपा सकती हूँ अपने गर्भ में
प्रेम के कोमल रहस्य अब भी....थक जाने पर भी
चलती उड़ती खनखनाती रहती हूँ
डरती हूँ रुक जाने से
शान्त हो जाने से
स्त्रीत्व के सूख जाने से' (पृष्ठ - 14/15 ; कविता - तब भी रहूँगी मैं)।
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7 वर्ष पहले

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