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Book Review: 1967 कश्मीर का परमेश्वरी आंदोलन - ‘समय की वो करवट कि जिसके बाद घृणा का असला बारूद जमता चला गया'

1967 kashmir ka parmeshwari aandolan book review in hindi
                
                                                         
                            

ये महज एक कहानी नहीं है बल्कि समय के उस करवट की दास्ताँ है कि जिसके बाद घाटी में घृणा और अलगाव का बारूद जमा होता चला गया। ‘1967 कश्मीर का परमेश्वरी आंदोलन' अपनी इस नई किताब का पहला परिचय लेखक आशीष कौल इस एक पंक्ति से देते हैं। एक आंदोलन जो कश्मीर में एक कश्मीरी पंडित बेटी के गुमने से चालू हुआ और जिसके ख़त्म होते ही जैसे घाटी की फ़िज़ा में बारूद मिलनी शुरू हो गयी। एक ऐसा आंदोलन जिसने कश्मीरी पंडितों का पौरुष भी देखा और देश के प्रति उसकी प्रतिबद्धता भी।  लेखक का दावा है कि, ’1990 में कश्मीरी पंडितों के जीवन में जो अमावस आयी उसका कृष्ण पक्ष इस आंदोलन के खात्मे के साथ ही शुरू हुआ था। ‘अपनी गुमशुदा बेटी की तलाश में कश्मीरी पंडितों के उसी ऐतिहासिक जन जागरण आंदोलन का ज़िंदा दस्तावेज़ है आशीष कौल की नई किताब '1967 कश्मीर का परमेश्वरी आंदोलन।' खूबसूरत श्रीनगर के रैनावारी में 1967 में एक शाम, एक लड़की अचानक गायब हो गई।

न कोई धमकी भरा फोन आया, न कोई शिकायतों भरा खत। आई तो सिर्फ एक खबर की वह है तो सही, पर लौटेगी नहीं। ‘हमारी बेटी वापस करो’ के नारों से कश्मीर का आकाश गूंज उठा। लड़की के गुमने से उठे भावनाओं के ज्वार भाटे ने कैसे एक ऐतिहासिक आंदोलन को जन्म दिया और कैसे घाटी में अल्पसंख्यक हो चुके कश्मीरी पंडितों ने एकजुट हो न सिर्फ एक आंदोलन का बिगुल बजाया, बल्कि सदियों से घूम रहे दमन चक्र को भी कुछ दिनों के लिए रोक लिया।श्रीनगर से दिल्ली तक सब कुछ थम सा गया। लेकिन फिर राजनीति की चौसर बिछी और शुरू हुआ कश्मीर के इतिहास का वो काला पन्ना, जिसने 1989-90  लिख दिया।
 
आज़ादी के अमृतकाल में जब हम पिछले एक साल से ऐतिहासिक आन्दोलनों को नए परिपेक्ष और समसामयिक सामजिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं, तब 1967 में कश्मीर में जन्मे और करीब महीने भर पले-बढ़े 'परमेश्वरीआंदोलन' पर लिखी गयी ये किताब हर मायने में दिलचस्प है।"ये कहानी गायब हुई लड़की की कहानी न होकर कश्मीरी पंडित समुदाय की उस जिजीविषा  की कहानी है, जो धोखों के थपेड़ों से कहीं पीछे दब गयी।" लेखक आशीष कौल के अनुसार मुट्ठी भर कश्मीरी पंडित जब अपनी बेटी के लिए एकजुट होकर दहाड़ रहे थे, तब उन दिनों की केंद्र सरकार जो पंडितों के अधिकारों के अतिक्रमण को रोकने और धारा 370 से कश्मीर को निजात पहुंचाने नहीं बल्कि इस आंदोलन को रोकने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री यशवंतराव चव्हाण के रूप में कश्मीर पहुंची थी। 

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3 वर्ष पहले

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