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kab tak nirbhaya Hyderabad rape and murder case

काव्य

#कबतकनिर्भयाः तू इस आंचल से एक परचम बना लेती तो अच्छा था…

दीपाली अग्रवाल

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क्या लिखें? कितना लिखें? कब तक लिखें। कलम कांपने लगी हैं अब, जिस स्याही को रक्त की तरह बहना था वह आंसुओं की तरह सूख चुकी है। चीखों को सुन-सुनकर कानों के परदे फट गए हैं। आत्माएं मर चुकी हैं और उनका पुनर्जन्म भी नहीं हुआ। अगर यह सत्य नहीं है तो द्रौपदी के चीरहरण से लेकर तेलंगाना की आग तक क्या कुछ बदल दिया हमने? कितनी बार कोशिश की उस विचार को आग लगा देने की जिसने सोचा कि किसी स्त्री को बिना सहमति के भी छुआ जा सकता है।

आग तो लगी लेकिन उन विचारों में नहीं, उन ज़िन्दा देहों में जिन्होंने समाज पर भरोसा कर लिया था। सती-प्रथा की आग से बची औरतें अब जघन्यता की आग में जलने लगी हैं। लेकिन उन देहों से उठते धुएं से समाज के फ़ेंफ़ड़े तो ख़राब हो चुके हैं लेकिन दम घुटना बाक़ी है। इस सभ्यता का विनाश अभी बाक़ी है।

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