बदलते सामाजिक माहौल और जीवन शैली से आत्महत्या के मामलों में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है। चिंताजन स्थिति यह हैं कि युवा ही नहीं बल्कि बुर्जुगों में भी आत्महत्या की प्रवृति बढ़ रही है। एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि पारिवारिक समस्याएं बुर्जुगों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ा रही हैं। एम्स मनोरोग विभाग के प्रो. अनन्या दास कहते हैं कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों के आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल आत्महत्या के मामलों में 5 से 8 फीसदी मामले 60 साल से अधिक आयु के बुजुर्गों के हैं। पिछले करीब 10 सालाें से बुजुर्गों की आत्महत्या संबंधी मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। बुजुर्गाें की आत्महत्या के प्रमुख कारण पारिवारिक समस्याए (करीब 33 फीसदी), मानसिक (20 फीसदी) व शारीरिक (28 फीसदी) समस्याएं हैं। बदलते सामाजिक माहौल व जीवन शैली में अधिकांश बुर्जुग घर में रह कर भी अकेले हैं। परिजनों का दुर्व्यहार, बीमारी, सामाजिक दूरी बुजुर्गों को आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर कर रही है। प्रो. अनन्यादास कहते हैं कि हमें घर में बुजुर्गों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने का प्रयास करना चाहिए। बुर्जुगों की शारीरिक उपेक्षा (भोजन, पानी, कपड़े, या उचित चिकित्सा देखभाल उपलब्ध न कराना), भावनात्मक उपेक्षा (नजरअंदाज करना, उन्हें अकेला छोड़ देना या उनसे बातचीत न करना), वित्तीय उपेक्षा (बुजुर्गों के धन या संपत्ति का गलत इस्तेमाल करना), परित्याग (किसी देखभाल करने वाले व्यक्ति का किसी ऐसे बुजुर्ग को अकेला छोड़ देना जो खुद अपनी देखभाल नहीं कर सकता।),आत्म-उपेक्षा (जब कोई बुजुर्ग स्वयं अपनी देखभाल करना बंद कर देता है, जैसे न खाना, न दवा लेना, या साफ-सफाई न करना। न करें।