चंपावत जिले के मानेश्वर शक्तिपीठ का एतिहासिक महत्व है। यहां आज भी ऋषि मुनि हवन यज्ञ करते दिखाई देते हैं। मान्यता है कि मानेश्वर महादेव शक्तिपीठ में अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित किया था। स्कंध पुराण के मानस खंड में मानेश्वर शक्तिपीठ का उल्लेख किया गया है। कहा जाता है यहां से पवित्र कैलाश मानसरोवर की सीमा शुरू होती है। मंदिर के अंदर मौजूद गुप्त नौले के जल से स्नान करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। बताया जाता है कि जब पांडव पुत्र माता कुंती के साथ अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में आए तो आमलकी एकादशी पर राजा पांडु की श्राद्ध तिथि थी। माता कुंती का प्रण था कि वह श्राद्ध कैलाश मानसरोवर के ही जल से करेगी। कुंती ने यह बात युधिष्ठिर को बताई तो उन्होंने अर्जुन से माता का प्रण पूरा करने को कहा। अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष से बाण मार कर यहां जल धारा पैदा की। इस जल से पांडु का श्राद्ध करने के बाद उन्होंने भगवान शिव का आभार प्रकट करने के लिए इस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की थी। जिस स्थान पर बाण मारा उसे वर्तमान में गुप्त नौली के नाम से जाना जाता है। इसका जल यहां निर्मित एक बावड़ी में एकत्र होता है। इस जल से स्नान करने पर पुण्य लाभ के साथ ही कई रोग व विकार दूर होने की बात कही जाती है। यहां कभी कैलास मानसरोवर यात्री रात्रि विश्राम करते थे।