गोंडा में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से मिट्टी की सेहत पर पड़ रहे दुष्प्रभाव और लोगों में बढ़ती बीमारियों को देखते हुए कृषि विभाग अब किसानों को जैविक खेती की ओर प्रेरित कर रहा है। विभाग ने किसानों को ढैंचा जैसी हरित खाद अपनाने की सलाह दी है, जो कम लागत में मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के साथ फसलों को पोषण भी प्रदान करती है। उप निदेशक कृषि प्रेम कुमार ठाकुर ने बताया कि ढैंचा एक महत्वपूर्ण हरित खाद फसल है, जिसे खेतों में बोकर कुछ समय बाद मिट्टी में पलट दिया जाता है। इससे भूमि में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है और रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है। उन्होंने बताया कि मई और जून का समय ढैंचा की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। उन्होंने कहा कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और फसलों में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है। वहीं जैविक खेती अपनाने से न केवल मिट्टी की सेहत सुधरती है, बल्कि उत्पादित अनाज और सब्जियां भी स्वास्थ्य के लिए अधिक सुरक्षित होती हैं। कृषि विभाग के अनुसार ढैंचा की फसल लगभग 45 से 50 दिनों में तैयार हो जाती है। इसके बाद इसे खेत में पलटने से जैविक पदार्थ बढ़ता है, जिससे मिट्टी भुरभुरी बनती है और पानी धारण करने की क्षमता भी बढ़ती है। इससे किसानों की लागत कम होती है और उत्पादन में भी सुधार देखने को मिलता है।