जिस घर को अपने खून-पसीने से सींचा, आज उसी घर की चौखट पर हमारे लिए जगह नहीं बची। ऐसा ठुकराया अपनों ने कि जब भी उनकी याद आती है, तो आँखें रो पड़ती हैं। यह दर्द अलीगढ़ के वृद्धाश्रम में रह रहे उन बुजुर्गों का है, जिनकी ढलती उम्र में सहारा बनने के बजाय अपनों ने ही उन्हें बेगाना कर दिया। तेज गति से भागते समाज की कड़वी सच्चाई यह है कि आज कई बुजुर्ग दुनिया से नहीं, बल्कि अपने ही बच्चों के दुर्व्यवहार और उपेक्षा के शिकार हैं।